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बहुत गरीबी देखी है मैंने, पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ता था...

Thu, 20 Oct 2022 11:46 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 20 Oct 2022 11:46 PM IST
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Seepahi made tahseeldar
झांसी। मैं शिकोहाबाद के एक छोटे से गांव छीछामई का रहने वाला हूं। मैंने बचपन से ही गांव में बहुत गरीबी देखी है। मुझे याद है कि...गांव के पेड़ के नीचे पट्टी पर बैठकर पढ़ाई करता था। पिताजी और दूसरे किसानों को साहूकारों से ब्याज पर पैसा उधार लेकर खेतों में बीज बोते देखता था तो लगता था कि मैं जल्दी से बड़ा हो जाऊं और कुछ काम करूं ताकि मेरे पिता को साहूकारों से पैसा न लेना पड़े। जब मैं 2016 में सिपाही बना तो अधिकारियों को देखकर मन में ठान लिया कि अब मुझे भी अधिकारी बनना है। ये छोटी सी कहानी किसान के उस होनहार बेटे अनिल चौधरी की है, जो इन दिनों झांसी पुलिस लाइन में तैनात हैं लेकिन अब ये नायब तहसीलदार बन चुके हैं। 19 अक्तूबर को यूपी पीसीएस का रिजल्ट निकला तो अधिकारियों ने अनिल की खूब पीठ थपथपाई।
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अनिल बताते हैं कि उनके पिता यशपाल सिंह गांव छीछामई में रहकर किसानी करते हैं। 15-16 बीघा जमीन पर खेती कर उन्होंने जैसे-तैसे उनके बड़े भाई नारायण, बहनें रेनू और प्रीती के अलावा उन्हें पढ़ाया। बचपन में टाट-पट्टी पर बैठकर गांव में पढ़ता था। हाईस्कूल में गांव के पास नगला गुलाल के स्कूल से 84 फीसदी नंबरों के साथ 2008-09 में हाईस्कूल किया तो पिता और मां बीरमति बहुत खुश हुए। गांव में इंटर कॉलेज नहीं था, इसलिए उन्हें आगरा के ककुआ गांव में नाना के पास पढ़ने भेज दिया गया। अनिल बताते हैं कि उन्होंने 73 फीसदी नंबरों के साथ आगरा पब्लिक स्कूल से इंटरमीडिएट की पढ़ाई के साथ-साथ सिपाही भर्ती परीक्षा भी दी। वर्ष 2016 में वह सिपाही बन गए।
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अनिल बताते हैं कि झांसी कोतवाली, सीओ कार्यालय और गुरसराय मेें तैनात रहने के बाद वह पुलिस लाइन में तैनात हुए। उन्होंने जब बड़े-बड़े अधिकारियों को देखा तो सोचा कि वह भी कुछ कर सकते हैं..और यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। वह पीसीएस की तैयारी में जुट गए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2021 में उनका चयन सब इंपेक्टर के लिए हो गया था लेकिन उन्होंने ज्वाइन नहीं किया। अब पीसीएस का रिजल्ट आया तो पता चला कि उनकी 21वीं रैंक आई है। अनिल का कहना है कि यूपीपीसीएस मेंस 2022 के लिए भी उनका चयन अवश्य होगा।
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अधिकारियों से कहता था मेरी नाइट ड्यूटी लगवा दीजिए...
झांसी। अनिल बताते हैं कि सिपाही की नौकरी के दौरान पढ़ाई करने के लिए बहुत समय नहीं मिल पाता था। किराये के कमरे में बहुत संसाधन नहीं थे। इसलिए सरकारी और प्राइवेट लाइब्रेरी ढूंढकर वहां पढ़ाई करता था। अक्सर दिन में ड्यूटी लगती थी तो अपने अधिकारियों से नाइट ड्यूटी लगवाने की मिन्नत करता था। ताकि दिन में लाइब्रेरी में पढ़ाई कर सकूं। अनिल बताते हैं कि कई बार जब नाइट ड्यूटी नहीं लगती थी तो कमरे में रात को पढ़ाई करता था।
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