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ब़ुंदेलखंड में भी होती सालाना दस करोड़ रुपये से अधिक टिकटों की कालाबाजारी
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rail ticket black marketing
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झांसी। नई दिल्ली में विशेष सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये के रेल ई टिकट की कालाबाजारी में एक गिरोह के पकड़े जाने के बाद से जांच एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। बुंदेलखंड में भी सालाना दस करोड़ से अधिक रुपये का अवैध कारोबार ई टिकट से होता है जिसकी गोपनीय तरीके से निगरानी शुरू कर दी है। पता किया जा रहा है कि यहां के अवैध कारोबारियों के भी तार कहीं आतंकी फंडिंग से तो नहीं जुड़े हैं।
आरपीएफ ने नई दिल्ली में मंगलवार को ऐसे गिरोह का खुलासा किया था, जो अवैध साफ्टवेयर के जरिये करोड़ों के रेल ई टिकट का कारोबार कर रहा था। गिरोह के 59 सदस्य पकड़े गए। गिरोह का सरगना बंगलादेश के एक आतंकी को फंडिंग कर रहा था। इस गिरोह के खुलासे के बाद जांच एजेंसियों ने अब सभी जगह निगरानी शुरू कर दी है, जहां आईआरसीटीसी की आड़ में अवैध साफ्टवेयर बनाकर टिकट का अवैध कारोबार हो रहा है। जांच एजेंसियों की बुंदेलखंड पर भी नजर है। वैसे आरपीएफ झांसी मंडल में पिछले छह महीने में 73 लोगों को ई टिकट का अवैध कारोबार करने के आरोप में पकड़ चुकी है, जिनके पास से एक करोड़ से अधिक के टिकटों का लेन- देन पकड़ा गया।
फर्जी आईडी और झांसी से रेलवे कनेक्टिविटी का भी शातिर कर सकते दुरुपयोग
झांसी से चारों दिशाओं में ट्रेन चलती हैं। यहां से मुंबई, दिल्ली समेत देश के प्रमुख शहरों के लिए अच्छी कनेक्टिविटी है। ऐसे में फर्जी आईडी पर धड़ल्ले से टिकट जारी होने पर दूसरे व्यक्ति के नाम-पते पर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की सुविधा है। यही नहीं, दूसरे शहरों में जाकर इन आईडी के सहारे मोबाइल व अन्य महत्वपूर्ण सामान खरीदने, होटलों में ठहरने, आर्थिक अपराध से लेकर आतंकी नेटवर्क में दुरुपयोग की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहचान छिपाए हुए शातिर लोग अपराध को अंजाम देकर एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं।
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- झांसी रेल मंडल में अभी तक कोई ऐसा मामले सामने नहीं आया है कि जिसमें अवैध साफ्टवेयर बनाकर टिकट बनाए गए हों। या कोई आतंकी फंडिंग की गई। फिर भी नई दिल्ली में हुए खुलासे के बाद सतर्कता बढ़ा दी गई है।
उमाकांत तिवारी, आरपीएफ कमांडेंट।
यह भी जानिए
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एक सॉफ्टवेयर एक महीने में निष्क्रिय हो जाता है, इसके बाद पुन: सॉफ्टवेयर को खरीदना पड़ता है। टिकट बुक करने वाले कुछ ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहे हैं जो ऑनलाइन आईआरसीटीसी के साफ्टवेयर को पहले हैक करता है, इसके बाद वह आईआरसीटीसी के साफ्टवेयर को खुद संचालित करके टिकट बनाने लगता है। कुछ समय में ही यह सॉफ्टवेयर एजेंट के लिए टिकट बना देता है। कुछ समय पहले भी दिल्ली व अन्य महानगरों में तत्काल के रिजर्वेशन में सॉफ्टवेयर से हो रहे खेल का खुलासा भी हो चुका है। जिसेक बाद पता चला कि एजेंट फास्ट सॉफ्टवेयर के जरिये पहले ही टिकट बुक कर लेते थे। सॉफ्टवेयर से पीएनआर जनरेट करने की प्रक्रिया तेज हो जाती थी। इसी का फायदा उठाकर एजेंट आईडी से लॉगइन कर एक साथ कई टिकट बुक कर लेते।
आईपी पते की होगी जांच
अगर किसी निजी अकाउंट से एक बार में तीन से ज्यादा तत्काल टिकट बुक होते हैं या लगातार उस अकाउंट से टिकट बुक हो रहे हैं तो आईपी पते के जरिए जांच की जाती है। साथ ही, निजी अकाउंट से मिलने वाले टिकट पर लिखा होता है कि यह टिकट बिक्री के लिए नहीं है। ऐसे टिकट पर यात्रा करने वाला अगर वैध कागजात नहीं दिखा पाता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
एजेंट के लिए जरूरी है प्रमाणपत्र
रेलवे से मान्यता प्राप्त एजेंट अपने नीचे सब एजेंट बना सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार सभी एजेंट्स की भी समय-समय पर जांच की जाती है। एजेंट्स के लिए उनके कार्यालय पर बोर्ड लगाना और खिड़की के सामने ही ऐसे स्थान पर सर्टिफिकेट लगाना जरूरी किया गया है, जहां से वह आम आदमी को दिखाई दे। अगर किसी एजेंट के पास ये दोनों चीजें नहीं हैं तो उससे टिकट बुक न कराएं और अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन पर सूचना दें।
तत्काल का समय
एसी के लिए तत्काल बुकिंग सुबह 10 बजे और स्लीपर के लिए सुबह 11 बजे का समय तय है। इसके पहले टिकट बुक नहीं होता। चंद सेकेंड में ही टिकटों की बिक्री हो जाती है, जिससे आम आदमी को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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आरपीएफ ने नई दिल्ली में मंगलवार को ऐसे गिरोह का खुलासा किया था, जो अवैध साफ्टवेयर के जरिये करोड़ों के रेल ई टिकट का कारोबार कर रहा था। गिरोह के 59 सदस्य पकड़े गए। गिरोह का सरगना बंगलादेश के एक आतंकी को फंडिंग कर रहा था। इस गिरोह के खुलासे के बाद जांच एजेंसियों ने अब सभी जगह निगरानी शुरू कर दी है, जहां आईआरसीटीसी की आड़ में अवैध साफ्टवेयर बनाकर टिकट का अवैध कारोबार हो रहा है। जांच एजेंसियों की बुंदेलखंड पर भी नजर है। वैसे आरपीएफ झांसी मंडल में पिछले छह महीने में 73 लोगों को ई टिकट का अवैध कारोबार करने के आरोप में पकड़ चुकी है, जिनके पास से एक करोड़ से अधिक के टिकटों का लेन- देन पकड़ा गया।
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फर्जी आईडी और झांसी से रेलवे कनेक्टिविटी का भी शातिर कर सकते दुरुपयोग
झांसी से चारों दिशाओं में ट्रेन चलती हैं। यहां से मुंबई, दिल्ली समेत देश के प्रमुख शहरों के लिए अच्छी कनेक्टिविटी है। ऐसे में फर्जी आईडी पर धड़ल्ले से टिकट जारी होने पर दूसरे व्यक्ति के नाम-पते पर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की सुविधा है। यही नहीं, दूसरे शहरों में जाकर इन आईडी के सहारे मोबाइल व अन्य महत्वपूर्ण सामान खरीदने, होटलों में ठहरने, आर्थिक अपराध से लेकर आतंकी नेटवर्क में दुरुपयोग की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहचान छिपाए हुए शातिर लोग अपराध को अंजाम देकर एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं।
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- झांसी रेल मंडल में अभी तक कोई ऐसा मामले सामने नहीं आया है कि जिसमें अवैध साफ्टवेयर बनाकर टिकट बनाए गए हों। या कोई आतंकी फंडिंग की गई। फिर भी नई दिल्ली में हुए खुलासे के बाद सतर्कता बढ़ा दी गई है।
उमाकांत तिवारी, आरपीएफ कमांडेंट।
यह भी जानिए
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एक सॉफ्टवेयर एक महीने में निष्क्रिय हो जाता है, इसके बाद पुन: सॉफ्टवेयर को खरीदना पड़ता है। टिकट बुक करने वाले कुछ ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहे हैं जो ऑनलाइन आईआरसीटीसी के साफ्टवेयर को पहले हैक करता है, इसके बाद वह आईआरसीटीसी के साफ्टवेयर को खुद संचालित करके टिकट बनाने लगता है। कुछ समय में ही यह सॉफ्टवेयर एजेंट के लिए टिकट बना देता है। कुछ समय पहले भी दिल्ली व अन्य महानगरों में तत्काल के रिजर्वेशन में सॉफ्टवेयर से हो रहे खेल का खुलासा भी हो चुका है। जिसेक बाद पता चला कि एजेंट फास्ट सॉफ्टवेयर के जरिये पहले ही टिकट बुक कर लेते थे। सॉफ्टवेयर से पीएनआर जनरेट करने की प्रक्रिया तेज हो जाती थी। इसी का फायदा उठाकर एजेंट आईडी से लॉगइन कर एक साथ कई टिकट बुक कर लेते।
आईपी पते की होगी जांच
अगर किसी निजी अकाउंट से एक बार में तीन से ज्यादा तत्काल टिकट बुक होते हैं या लगातार उस अकाउंट से टिकट बुक हो रहे हैं तो आईपी पते के जरिए जांच की जाती है। साथ ही, निजी अकाउंट से मिलने वाले टिकट पर लिखा होता है कि यह टिकट बिक्री के लिए नहीं है। ऐसे टिकट पर यात्रा करने वाला अगर वैध कागजात नहीं दिखा पाता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
एजेंट के लिए जरूरी है प्रमाणपत्र
रेलवे से मान्यता प्राप्त एजेंट अपने नीचे सब एजेंट बना सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार सभी एजेंट्स की भी समय-समय पर जांच की जाती है। एजेंट्स के लिए उनके कार्यालय पर बोर्ड लगाना और खिड़की के सामने ही ऐसे स्थान पर सर्टिफिकेट लगाना जरूरी किया गया है, जहां से वह आम आदमी को दिखाई दे। अगर किसी एजेंट के पास ये दोनों चीजें नहीं हैं तो उससे टिकट बुक न कराएं और अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन पर सूचना दें।
तत्काल का समय
एसी के लिए तत्काल बुकिंग सुबह 10 बजे और स्लीपर के लिए सुबह 11 बजे का समय तय है। इसके पहले टिकट बुक नहीं होता। चंद सेकेंड में ही टिकटों की बिक्री हो जाती है, जिससे आम आदमी को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।