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Jhansi News: ओरछा के राजा ने ब्रज के मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए दिया था 81 मन सोना
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झांसी। बृज और बुंदेलखंड का सांस्कृतिक और धार्मिक नाता कई सदियों पुराना है। बुंदेला राजाओं के द्वारा मथुरा और वृंदावन के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया, इसका उल्लेख इतिहास में मिलता है। सोलहवी सदी में ओरछा के महाराजा वीरसिंह बुंदेला द्वारा मथुरा और वृंदावन के मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए 81 मन सोने का दान मथुरा में यमुना नदी किनारे स्थित विश्राम घाट पर एक यज्ञ के दौरान किया था। इस स्वर्णदान का उल्लेख विश्राम घाट पर लगे शिलालेख में भी है, इसके अलावा यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों को इस घाट के गाइड भी इस शिलालेख को दिखाने के साथ वीरसिंह बुंदेला की धर्म परायणता की कहानी विस्तार से बताते हैं।
यमुना किनारे किया था बुंदेला राजा ने यज्ञ
साहित्यकार रतिभान कंज बताते हैं कि ओरछा के शासक वीरसिंह बुंदेला ने 1675 में मथुरा में यमुना किनारे विश्राम घाट पर एक यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ के समापन पर विद्वानों ने उन्हें सलाह दी कि उनके पिता मधुकर शाह जी रसिकबिहारी के भक्त रहे हैं तथा मथुरा और वृंदावन में उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, इसलिए उन्हें भी याज्ञिक ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के साथ ही मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए कुछ धन दान में देना चाहिए। इस पर यज्ञ के दौरान ही राजा ने अपने नौ पुत्रों को संदेश भेजा कि वह स्वर्णदान करना चाहते हैं, इसके लिए नौ मन यानी कि तीन क्विंटल साठ किलो सोने की आवश्यकता है, पर हुआ यह कि वीरसिंह जू देव के नौ पुत्र नौ-नौ मन सोना लेकर यज्ञ स्थल पर पहुंच गए तथा इस तरह 81 मन यानी कि 32 क्विंटल 40 किलो सोना यज्ञ स्थल पर पहुंच गया। इस सोने में से कुछ याज्ञिक ब्राह्मणों को दान देने के बाद शेष सोना मथुरा और वृंदावन के संतों . महंतों व पुजारियों को इस आशय के साथ दान किया गया था कि वह इसे मंदिरों के जीर्णोद्धार व संचालन में खर्च करें। इस घटना को उल्लेखित करने वाला शिलालेख आज भी मथुरा के विश्राम घाट पर लगा हुआ है। इसके अलावा इसका उल्लेख इतिहासकार स्व. लक्ष्मण सिंह गौर की पुस्तक ओरछा की महिमा के पृष्ठ क्रमांक 69 पर है।
वीरसिंह जूदेव चरित में है उल्लेख
श्रीमद् भागवत कथा वाचक पं. बृजेश त्रिपाठी बताते हैं कि यह तो सर्व विदित है कि मथुरा के केशवराय (कृष्णजन्म भूमि) मंदिर का जीर्णोद्धार ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने करवाया था, पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अन्य मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए भी 81 मन सोने का दान किया था। इस बात का उल्लेख मथुरा के विश्राम घाट पर लगे शिलालेख में होने के साथ ही महाकवि केशव के काव्य खंड वीर सिंह देव चरित में भी है। इतिहासकार लक्ष्मण सिंह गौर की पुस्तक ओरछा के इतिहास के पृष्ठ क्रमांक 179 पर भी इसका जिक्र है। इसीलिए बुंदेली चौपालों में गाया जाता है, ब्रज बिन है बुंदेली सूनी।
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यमुना किनारे किया था बुंदेला राजा ने यज्ञ
साहित्यकार रतिभान कंज बताते हैं कि ओरछा के शासक वीरसिंह बुंदेला ने 1675 में मथुरा में यमुना किनारे विश्राम घाट पर एक यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ के समापन पर विद्वानों ने उन्हें सलाह दी कि उनके पिता मधुकर शाह जी रसिकबिहारी के भक्त रहे हैं तथा मथुरा और वृंदावन में उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, इसलिए उन्हें भी याज्ञिक ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के साथ ही मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए कुछ धन दान में देना चाहिए। इस पर यज्ञ के दौरान ही राजा ने अपने नौ पुत्रों को संदेश भेजा कि वह स्वर्णदान करना चाहते हैं, इसके लिए नौ मन यानी कि तीन क्विंटल साठ किलो सोने की आवश्यकता है, पर हुआ यह कि वीरसिंह जू देव के नौ पुत्र नौ-नौ मन सोना लेकर यज्ञ स्थल पर पहुंच गए तथा इस तरह 81 मन यानी कि 32 क्विंटल 40 किलो सोना यज्ञ स्थल पर पहुंच गया। इस सोने में से कुछ याज्ञिक ब्राह्मणों को दान देने के बाद शेष सोना मथुरा और वृंदावन के संतों . महंतों व पुजारियों को इस आशय के साथ दान किया गया था कि वह इसे मंदिरों के जीर्णोद्धार व संचालन में खर्च करें। इस घटना को उल्लेखित करने वाला शिलालेख आज भी मथुरा के विश्राम घाट पर लगा हुआ है। इसके अलावा इसका उल्लेख इतिहासकार स्व. लक्ष्मण सिंह गौर की पुस्तक ओरछा की महिमा के पृष्ठ क्रमांक 69 पर है।
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वीरसिंह जूदेव चरित में है उल्लेख
श्रीमद् भागवत कथा वाचक पं. बृजेश त्रिपाठी बताते हैं कि यह तो सर्व विदित है कि मथुरा के केशवराय (कृष्णजन्म भूमि) मंदिर का जीर्णोद्धार ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने करवाया था, पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अन्य मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए भी 81 मन सोने का दान किया था। इस बात का उल्लेख मथुरा के विश्राम घाट पर लगे शिलालेख में होने के साथ ही महाकवि केशव के काव्य खंड वीर सिंह देव चरित में भी है। इतिहासकार लक्ष्मण सिंह गौर की पुस्तक ओरछा के इतिहास के पृष्ठ क्रमांक 179 पर भी इसका जिक्र है। इसीलिए बुंदेली चौपालों में गाया जाता है, ब्रज बिन है बुंदेली सूनी।
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