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Jhansi News: छाती के पीछे रीढ़ में सुन्नता के इंजेक्शन से सिजेरियन डिलीवरी के जोखिम हुए कम
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। उच्च रक्तचाप प्रसव पीड़िता के ऑपरेशन के दौरान छाती के पीछे रीढ़ में सुन्नता के इंजेक्शन से ब्लड प्रेशर व हृदय गति नियंत्रित पाई गई। वहीं, कमर की रीढ़ में सुन्नता के इंजेक्शन से रक्तचाप गिरने का जोखिम तुलनात्मक रूप से ज्यादा पाया गया। ये तथ्य मेडिकल कॉलेज में पिछले 10 माह में 160 गर्भवती महिलाओं पर हुए शोध में सामने आए हैं, जो सीटीआरआई (क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया) में पंजीकृत हो गया है। जर्नल में प्रकाशन के लिए भेज दिया गया है।
शोधकर्ता एनेस्थिसिया विभाग के प्रोफेसर (डॉ.) अंशुल जैन ने बताया कि शोध में गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से पीड़ित 160 महिलाओं को शामिल किया गया। 80 महिलाओं को छाती के पीछे की रीढ़ (टी-8 व टी-10) में सुन्नता के इंजेक्शन दिए गए। इससे सिर्फ पेट व उसके आसपास हिस्सा सुन्न रहा। टांगों की मांसपेशियों में शक्ति (मोटर फंक्शन) बनी रही। ब्लड प्रेशर व ह्रदय गति स्थित रही। जटिलता भी काफी कम रही। वहीं, 80 महिलाओं को कमर की रीढ़ में सुन्नता के इंजेक्शन दिए गए। परिणाम से पता चला कि दोनों ग्रुप की महिलाओं में ऑपरेशन के दौरान सुन्नता सही रही। छाती की रीढ़ में सुन्नता का इंजेक्शन दिया गया तो रक्तचाप गिरने का जोखिम 11.7 फीसदी रहा। जबकि, कमर में सुन्नता का इंजेक्शन देने पर रक्तचाप गिरने का जोखिम 26.3 फीसदी रहा।
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एनेस्थीसिया विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर (डॉ.) शिवाली पांडेय ने बताया कि छाती के पीछे रीढ़ में सुन्नता (थोरैसिक तकनीक) से दर्द नियंत्रण (एनाल्जेसिया), मांसपेशियों की पर्याप्त शिथिलता (मसल रिलेक्सेशन) और कम जटिलताओं के साथ सर्जरी होती है। स्त्री एवं प्रसूति विभाग की एसोसिएशन प्रोफेसर (डॉ.) दिव्या जैन ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप आम है। ऐसे मरीजों का प्रबंधन कठिन होता है क्योंकि सूजन व उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं होती हैं। ऐसे में सुरक्षित और प्रभावशाली एनेस्थीसिया तकनीक की जरूरत होती है। शोध में डॉ. फहाद सुहैल, डॉ. सिप्पी अग्रवाल और डॉ. चारू ठाकुर (सीनियर रेजिडेंट) भी शामिल रहे।
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0- क्या होता है प्री-एक्लेम्पिया
यह गंभीर चिकित्सा स्थिति है, जो गर्भावस्था के करीब 20 सप्ताह बाद हो सकती है। इसमें गर्भवती को उच्च रक्तचाप, पेशाब में प्रोटीन, सूजन, सिरदर्द आदि की दिक्कत होती है। ये दिक्कतें प्रसव बाद सही हो जाती हैं।