फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   not see holy color in baradwari

बाराद्वारी में अब नहीं बिखरते होली के रंग

Mon, 18 Mar 2019 01:44 AM IST
jhansi Published by: देवेंद्र कुमार Updated Mon, 18 Mar 2019 01:44 AM IST
विज्ञापन
not see holy color in baradwari
brawdwari jhansi - फोटो : amar ujala, jhansi news
कभी महानगर के ऐतिहासिक किले में जमकर होली खेली जाती थी। राजा गंगाधर राव और उनके सामंत किले की बाराद्वारी में बैठकर होली का लुत्फ उठाते थे। नृत्य संगीत की महफिल सजती थी। बुंदेली राई नृत्य, स्वांग, नाटक के साथ ही कलाकार महाराष्ट्र का लावणी नृत्य प्रस्तुत करते थे, जिन्हें देखने के लिए नगरवासी जुटते थे। कलाकारों का सम्मान होता था और शहर में उनकी शोभायात्रा भी निकाली जाती थी। लेकिन, अब वह परंपराएं नहीं रहीं। समय के साथ होली के रंग भी बदल गए। रंगों में डूबने व फागों से गूंजने वाले किले में अब समय का सन्नाटा है। पक्षियों की आवाज जरूर वहां के सन्नाटे को तोड़ती रहती है। पर्यटक जरूर यहां आकर राजा की यादों को ताजा करते हैं।
विज्ञापन

 झांसी शहर की एक बड़ी पहचान लोक कला संस्कृति को बढ़ावा देना भी है। रानी लक्ष्मीबाई के पति राजा गंगाधर राव ने किले के उत्तरी द्वार, जहां से कभी शहर के लोग किले में प्रवेश करते थे, उसके समीप वर्ष 1838-53 के बीच बाराद्वरी का निर्माण कराया था। इस बाराद्वारी के ऊपर पानी मसक से भरा जाता था, जो झरने की तरह नीचे गिरता था। इसमें बैठकर राजा और उनके मित्र सामने बने विशाल मंच पर नृत्य संगीत का लुत्फ उठाते थे। इससे लगा एक कक्ष बना हुआ है, जिसमें कलाकार तैयार होते थे।
विज्ञापन

झांसी के इतिहास के जानकार मुकुंद मेहरोत्रा के अनुसार बाराद्वारी पर होलिका दहन के साथ रंगोत्सव तीन दिन मनाया जाता था, जिसे देखने के लिए नगर के लोग जुटते थे। इन्हें मराठा शासन द्वारा इमरती खिलाई जाती थी। रंगोत्सव में कलाकारों का सम्मान होता था। इसके बाद चौथ और पंचमी को रंगोत्सव बड़ा बाजार मुरली मनोहर मंदिर में मनाया जाता था, जहां कलाकारों का सम्मान होता था, उनकी शोभायात्रा शहर में निकाली जाती थी। उनके अनुसार बाराद्वारी में रंगोत्सव की परंपरा राजा गंगाधर राव के निधन के साथ ही समाप्त हो गई और लोग इसे भुला बैठे।
विज्ञापन
विज्ञापन



संवारा जा रहा है बाराद्वरी को
पुरातत्व विभाग द्वारा बाराद्वरी को संवारा जा रहा है। कलाकारों के सजने का कक्ष दो से तीन वर्ष पहले तक बेहद जीर्णशीर्ण था, लेकिन इसे नया रूप दे दिया गया है। हालांकि मुख्य बाराद्वारी की दीवारें आज भी कई नामों से पटी पड़ी हुई हैं, लेकिन इसके सामने मुख्य मंच और शेष परिसर अब खूबसूरत नजर आता है। बाराद्वारी के ऊंचे मंच पर चौकोर लघु कक्ष हैं। इसके नीचे तलघर है, जो जल भंडारण में काम आता था। बाराद्वारी की छत  कुंड के रूप में बनाई गई है। इस कुंड से पानी चारों दिशाओं में बहता था। पश्चिम में मुगल शैली का सुंदर फव्वारा है।


परवा पर होली न खेलने का कारण
झांसी में होलिका दहन के ठीक अगले दिन परवा पर होली नहीं खेलने की परंपरा है। इसको लेकर कई मान्यताएं हैं। इनमें एक ये है कि परवा पर 15 मार्च 1854 को लोगों को पता चला कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने झांसी का अधिग्रहण कर लिया है और दत्तक पुत्र को अमान्य कर दिया है। इस पर लोगों ने होली नहीं खेली। दूसरी मान्यता है कि इस दिन राजा गंगाधर राव का निधन हुआ था। तीसरी मान्यता है कि एरच के राजा और प्रहलाद के पिता हिरण्याकश्यप का वध भगवान विष्णु के अवतार नृसिंह भगवान ने किया था। ऐसे में परवा पर लोग होली नहीं खेलते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed