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‘प्लास्टिक’ पर रोक के बिना ‘वेस्ट मैनेजमेंट’
ब्यूरो
Updated Fri, 23 Oct 2015 12:56 AM IST
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झांसी। शहर को प्लास्टिक कचरा मुक्त बनाने के लिए नगर निगम द्वारा चलाया जा रहा ‘प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट’ कार्यक्रम पॉलीथिन के हो रहे उपयोग के कारण कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। धड़ल्ले से उपयोग में ली जा रही पॉलीथिन कचरे के रूप में नालियों में जाकर उन्हें चोक करने का काम कर रही है।
पर्यावरण के लिए 40 माइक्रोन से कम साइज की पॉलीथिन को खतरनाक मानते हुए सरकार ने उस पर रोक लगा रखी है। इस साइज की पॉलीथिन के निर्माण और उसके उपयोग दोनों पर लगी रोक के बावजूद बाजार में यह बहुतायत में उपलब्ध है। यह पॉलीथिन जब कचरे के रूप में नालियों में जाती है तो कचरे के साथ मिलकर नाली को चोक कर देती है, वहीं कचरा घरों में यह पशु का ग्रास बन कर उनकी मौत का कारण बनती है। नगर निगम प्रशासन आए दिन छापा मारने की रस्म अदायगी कर पॉलीथिन जमा करता है, लेकिन सजा कम होने के कारण इसके उपयोग पर रोक नहीं लग पा रही है।
यह पॉलीथिन जब कचरे में जाती तो उसे रैगपिकर्स उठाते नहीं हैं, क्योंकि इस प्लास्टिक की बिक्री नहीं हो पाती है। इस कारण यह कचरे में जाकर जमीन की उर्वरा शक्ति को खराब करती है।
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वहीं डिस्पोजल वाले कप, गिलास व थालियां भी पर्यावरण के दुश्मन हैं। पॉलीथिन की तरह यह भी बिकते नहीं हैं और जमीन के अंदर जाकर मृदा प्रदूषण का कारण बनते हैं। डिस्पोजल सामग्री और पॉलीथिन पर रोक के बिना प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट की सफलता संभव नहीं है।
मामूली है जुर्माना
पॉलीथिन पकड़े जाने पर दुकानदार पर अधिकतम दो हजार रुपये का जुर्माना लगता है, जिससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता
40 माइक्रोन से पतली पॉलीथिन को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, इसके बावजूद इसका उपयोग होना पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। नगर निगम समय-समय पर छापा मारी करता है, लेकिन अभियान प्रभावी न होने के कारण इस पॉलीथिन का उपयोग बंद नहीं हो पा रहा है।
राकेश सोलंकी
कार्यक्रम अधिकारी
प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट
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पर्यावरण के लिए 40 माइक्रोन से कम साइज की पॉलीथिन को खतरनाक मानते हुए सरकार ने उस पर रोक लगा रखी है। इस साइज की पॉलीथिन के निर्माण और उसके उपयोग दोनों पर लगी रोक के बावजूद बाजार में यह बहुतायत में उपलब्ध है। यह पॉलीथिन जब कचरे के रूप में नालियों में जाती है तो कचरे के साथ मिलकर नाली को चोक कर देती है, वहीं कचरा घरों में यह पशु का ग्रास बन कर उनकी मौत का कारण बनती है। नगर निगम प्रशासन आए दिन छापा मारने की रस्म अदायगी कर पॉलीथिन जमा करता है, लेकिन सजा कम होने के कारण इसके उपयोग पर रोक नहीं लग पा रही है।
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यह पॉलीथिन जब कचरे में जाती तो उसे रैगपिकर्स उठाते नहीं हैं, क्योंकि इस प्लास्टिक की बिक्री नहीं हो पाती है। इस कारण यह कचरे में जाकर जमीन की उर्वरा शक्ति को खराब करती है।
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वहीं डिस्पोजल वाले कप, गिलास व थालियां भी पर्यावरण के दुश्मन हैं। पॉलीथिन की तरह यह भी बिकते नहीं हैं और जमीन के अंदर जाकर मृदा प्रदूषण का कारण बनते हैं। डिस्पोजल सामग्री और पॉलीथिन पर रोक के बिना प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट की सफलता संभव नहीं है।
मामूली है जुर्माना
पॉलीथिन पकड़े जाने पर दुकानदार पर अधिकतम दो हजार रुपये का जुर्माना लगता है, जिससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता
40 माइक्रोन से पतली पॉलीथिन को सरकार ने प्रतिबंधित किया है, इसके बावजूद इसका उपयोग होना पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। नगर निगम समय-समय पर छापा मारी करता है, लेकिन अभियान प्रभावी न होने के कारण इस पॉलीथिन का उपयोग बंद नहीं हो पा रहा है।
राकेश सोलंकी
कार्यक्रम अधिकारी
प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट