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मोंठ का ट्राॅमा सेंटर : डॉक्टर तो हैं, लेकिन उपकरण ही नहीं
Thu, 23 Jan 2025 01:44 AM IST
झांसी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
Updated Thu, 23 Jan 2025 01:44 AM IST
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आठ साल पहले पौने तीन करोड़ से हुआ था निर्माण, मरहम पट्टी करके मरीजों को कर दिया जाता रेफर, वार्ड बॉय, ओटी तकनीकी सहायक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
मोंठ। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में पौने तीन करोड़ से आठ साल पहले बना ट्रामा सेंटर सिर्फ मरहम पट्टी के ही काम आता है। यहां पर्याप्त डॉक्टरों की तैनाती तो है लेकिन, आवश्यक सुविधाएं, मशीनें और उपकरण नहीं हैं। यही नहीं वार्ड बॉय, ओटी तकनीकी सहायक, स्वीपर और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं है।
झांसी और उरई के बीच की दूरी 112 किमी है। इस मार्ग पर मोंठ में बना ट्रामा सेंटर निर्माण के कई सालों बाद तक स्टोर रूम ही बना रहा है। करीब तीन साल पहले एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों की तैनाती हुई। इसके बाद सेंटर चालू किया गया। हादसे के मरीजों को पहले सीएचसी के इमरजेंसी कक्ष में उपचार दिया जाता था। अब उनका इलाज दोपहर 4 बजे के बाद ट्रामा सेंटर में होता है। हालांकि यहां आईसीयू, आधुनिक ओटी, हड्डी रोग के लिए ऑपरेशन का सामान रॉड-प्लेट, सीटी स्कैन, डिजिटल एक्सरे मशीन, अल्ट्रासाउंड मशीन जैसी सुविधाएं नहीं हैं। यहां एनेस्थीसिया के चार, ऑर्थोपेडिक के दो और एक सामान्य सर्जन की तैनाती है। चार इमरजेंसी मेडिकल अफसर तैनात हैं। लेकिन, दुर्घटना में हड्डी के अलावा सबसे महत्वपूर्ण सिर की चोट के लिए न्यूरो सर्जन तथा न्यूरो फिजीशियन की तैनाती नहीं है।
लीवर और किडनी की नहीं होती जांच
ट्रामा सेंटर में पैथोलॉजी लैब बना हुआ है। लेकिन, जांचें पूरी नहीं होती है। लीवर और किडनी की जांच नहीं हो पाती है। इसकी वजह ऑपरेटर और टेक्ननीशियन की तैनानी न होना है।
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अस्पताल में उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। वहीं, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। - डॉ. माता प्रसाद राजपूत, अधीक्षक, सीएचसी
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संवाद न्यूज एजेंसी
मोंठ। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में पौने तीन करोड़ से आठ साल पहले बना ट्रामा सेंटर सिर्फ मरहम पट्टी के ही काम आता है। यहां पर्याप्त डॉक्टरों की तैनाती तो है लेकिन, आवश्यक सुविधाएं, मशीनें और उपकरण नहीं हैं। यही नहीं वार्ड बॉय, ओटी तकनीकी सहायक, स्वीपर और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं है।
झांसी और उरई के बीच की दूरी 112 किमी है। इस मार्ग पर मोंठ में बना ट्रामा सेंटर निर्माण के कई सालों बाद तक स्टोर रूम ही बना रहा है। करीब तीन साल पहले एक दर्जन से अधिक डॉक्टरों की तैनाती हुई। इसके बाद सेंटर चालू किया गया। हादसे के मरीजों को पहले सीएचसी के इमरजेंसी कक्ष में उपचार दिया जाता था। अब उनका इलाज दोपहर 4 बजे के बाद ट्रामा सेंटर में होता है। हालांकि यहां आईसीयू, आधुनिक ओटी, हड्डी रोग के लिए ऑपरेशन का सामान रॉड-प्लेट, सीटी स्कैन, डिजिटल एक्सरे मशीन, अल्ट्रासाउंड मशीन जैसी सुविधाएं नहीं हैं। यहां एनेस्थीसिया के चार, ऑर्थोपेडिक के दो और एक सामान्य सर्जन की तैनाती है। चार इमरजेंसी मेडिकल अफसर तैनात हैं। लेकिन, दुर्घटना में हड्डी के अलावा सबसे महत्वपूर्ण सिर की चोट के लिए न्यूरो सर्जन तथा न्यूरो फिजीशियन की तैनाती नहीं है।
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लीवर और किडनी की नहीं होती जांच
ट्रामा सेंटर में पैथोलॉजी लैब बना हुआ है। लेकिन, जांचें पूरी नहीं होती है। लीवर और किडनी की जांच नहीं हो पाती है। इसकी वजह ऑपरेटर और टेक्ननीशियन की तैनानी न होना है।
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अस्पताल में उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। वहीं, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। - डॉ. माता प्रसाद राजपूत, अधीक्षक, सीएचसी