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सीने पर गोली खाकर देश के लिए हो गए शहीद, आजाद भारत में नहीं बन सका स्मारक
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झांसी। महात्मा गांधी के निर्देश पर पूरे देश में चलाए गए सत्याग्रही झंडा आंदोलन के दौरान मऊरानीपुर तहसील की इमारत पर ब्रिटिश झंडा उतारकर सीने पर गोली खाकर तिरंगा फहराने वाले शहीदों को आजाद भारत में अब गिनेचुने लोग ही जानते हैं। जहां अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर गोली चलवाई थी, उस स्थान पर आजादी के बाद भी कोई स्मारक नहीं बनाया गया है। चंदू रंगरेज और रज्जू रंगरेज दो स्वतंत्रता सेनानी मौके पर ही शहीद हो गए थे।
ब्रिटिश व ओरछा रियासत का झंडा उतार दिया था तहसील की इमारत से
इतिहास की प्रवक्ता प्रीति निगम बताती हैं कि बात 1930 की है, इस दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में सत्याग्रही झंडा आंदोलन चल रहा था। झांसी जिले के ही सिमरधा गांव के निवासी बैजनाथ राजपूत, चंदू रंगरेज, और रज्जू रंगरेज ने अंग्रेज सरकार की आंखों में धूल झोंककर मऊरानीपुर में स्थित प्राचीन तहसील की इमारत पर चढ़कर ब्रिटिश सरकार और ओरछा रियासत का झंडा उतारकर सत्याग्रह आंदोलन का तिरंगा झंडा इमारत पर चढ़ाकर भारत माता की जय के जयकारे लगा दिए थे। पलक झपकते ही अंग्रेज सरकार के सैनिकों में फायरिंग कर दी, जिससे बैजनाथ गंभीर रूप से घायल हो गए थे तथा चंदू रंगरेज और रज्जू रंगरेज मौके पर ही शहीद हो गए थे। सिमरधा के इन शहीदों के नाम इतिहास की किताबों में तो दर्ज हैं पर मऊरानीपुर का वह स्थान जहां पर इन्होंने शहादत दी थी, वहां पर इनकी स्मृति में न तो कोई स्मारक हैं और न ही शिला पट्टिका। राष्ट्रीय पर्वों पर भी इनके इस बलिदान को कोई याद करने वाला नहीं होता है।
सेनानियों की स्मृति में बनाया जाए स्मारक
शिक्षाविद् दीपक बिरथरे बताते हैं कि झंडा आंदोलन के दौरान अपनी शहादत देने वाले दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति में एक स्मारक का निर्माण कराया जाना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़िया इनके बलिदान की गाथा से परिचित हो सकें। देश स्वतंत्र होने के बाद सरकार और उसके नुमाइंदों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों का स्मारक बनाने के साथ ही समय समय पर यहां कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इनकी गौरव गाथा से परिचित करवाएं, यही इन शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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ब्रिटिश व ओरछा रियासत का झंडा उतार दिया था तहसील की इमारत से
इतिहास की प्रवक्ता प्रीति निगम बताती हैं कि बात 1930 की है, इस दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में सत्याग्रही झंडा आंदोलन चल रहा था। झांसी जिले के ही सिमरधा गांव के निवासी बैजनाथ राजपूत, चंदू रंगरेज, और रज्जू रंगरेज ने अंग्रेज सरकार की आंखों में धूल झोंककर मऊरानीपुर में स्थित प्राचीन तहसील की इमारत पर चढ़कर ब्रिटिश सरकार और ओरछा रियासत का झंडा उतारकर सत्याग्रह आंदोलन का तिरंगा झंडा इमारत पर चढ़ाकर भारत माता की जय के जयकारे लगा दिए थे। पलक झपकते ही अंग्रेज सरकार के सैनिकों में फायरिंग कर दी, जिससे बैजनाथ गंभीर रूप से घायल हो गए थे तथा चंदू रंगरेज और रज्जू रंगरेज मौके पर ही शहीद हो गए थे। सिमरधा के इन शहीदों के नाम इतिहास की किताबों में तो दर्ज हैं पर मऊरानीपुर का वह स्थान जहां पर इन्होंने शहादत दी थी, वहां पर इनकी स्मृति में न तो कोई स्मारक हैं और न ही शिला पट्टिका। राष्ट्रीय पर्वों पर भी इनके इस बलिदान को कोई याद करने वाला नहीं होता है।
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सेनानियों की स्मृति में बनाया जाए स्मारक
शिक्षाविद् दीपक बिरथरे बताते हैं कि झंडा आंदोलन के दौरान अपनी शहादत देने वाले दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति में एक स्मारक का निर्माण कराया जाना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़िया इनके बलिदान की गाथा से परिचित हो सकें। देश स्वतंत्र होने के बाद सरकार और उसके नुमाइंदों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों का स्मारक बनाने के साथ ही समय समय पर यहां कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इनकी गौरव गाथा से परिचित करवाएं, यही इन शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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