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Jhansi News: बुंदेलखंड की संस्कृति की पहचान है ‘मामुलिया’
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वीरेंद्र तिवारी
टोड़ी फतेहपुर। बुंदेलखंड की प्राचीन लोक परंपराएं आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक ‘मामुलिया’। यह परंपरा पितृपक्ष के 15 दिनों के दौरान मनाई जाती है, जो बुंदेलखंड की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है।
मामुलिया की परंपरा में छोटी बच्चियां बबूल की कंटीली टहनी को रंग-बिरंगे फूलों से सजाती हैं। इसके बाद वे सजी हुई मामुलिया को लेकर घर-घर जाती हैं। वहां वे पारंपरिक लोकगीत गाकर लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ती हैं। वे ‘मामुलिया मोरी मामुलिया’ जैसे गीत गाती हैं। इन गीतों से बालिकाएं लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाती हैं। ग्रामीण भी बच्चियों को प्रसन्नतापूर्वक रुपये-पैसे और अनाज देकर उनका उत्साह बढ़ाते हैं। अमावस्या के दिन मामुलिया का विसर्जन नदी में पूजा के बाद किया जाता है।
(संवाद)
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लोक मान्यताएं और संबंध
लोक मान्यताओं के अनुसार, मामुलिया पूर्वजों के स्मरण और तर्पण से जुड़ी एक प्रतीकात्मक परंपरा है। बुंदेलखंड के लोकजीवन में इसका संबंध आगे आने वाले ‘सुआटा’ पर्व से भी जोड़ा जाता है। लोककथाओं में मामुलिया और सुआटा को भाई-बहन के रूप में देखा जाता है। यह परंपरा धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं की भी वाहक है।
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फोटो-- -- 10TOD_M_1_10102026_323.jpg
परंपरा पर आधुनिकीकरण का प्रभाव
इतिहासकार प्रद्युम्न तिवारी ने बताया कि करीब चार दशक पहले तक यह परंपरा कस्बों में भी दिखती थी। आधुनिकीकरण, टेलीविजन और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव से यह धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। आज की युवा पीढ़ी के अनेक बच्चों को मामुलिया के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे दौर में नन्हीं बालिकाओं द्वारा इसे निभाना सराहनीय पहल है। नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से परिचित कराना आवश्यक है।
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टोड़ी फतेहपुर। बुंदेलखंड की प्राचीन लोक परंपराएं आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक ‘मामुलिया’। यह परंपरा पितृपक्ष के 15 दिनों के दौरान मनाई जाती है, जो बुंदेलखंड की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है।
मामुलिया की परंपरा में छोटी बच्चियां बबूल की कंटीली टहनी को रंग-बिरंगे फूलों से सजाती हैं। इसके बाद वे सजी हुई मामुलिया को लेकर घर-घर जाती हैं। वहां वे पारंपरिक लोकगीत गाकर लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ती हैं। वे ‘मामुलिया मोरी मामुलिया’ जैसे गीत गाती हैं। इन गीतों से बालिकाएं लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाती हैं। ग्रामीण भी बच्चियों को प्रसन्नतापूर्वक रुपये-पैसे और अनाज देकर उनका उत्साह बढ़ाते हैं। अमावस्या के दिन मामुलिया का विसर्जन नदी में पूजा के बाद किया जाता है।
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लोक मान्यताएं और संबंध
लोक मान्यताओं के अनुसार, मामुलिया पूर्वजों के स्मरण और तर्पण से जुड़ी एक प्रतीकात्मक परंपरा है। बुंदेलखंड के लोकजीवन में इसका संबंध आगे आने वाले ‘सुआटा’ पर्व से भी जोड़ा जाता है। लोककथाओं में मामुलिया और सुआटा को भाई-बहन के रूप में देखा जाता है। यह परंपरा धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं की भी वाहक है।
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परंपरा पर आधुनिकीकरण का प्रभाव
इतिहासकार प्रद्युम्न तिवारी ने बताया कि करीब चार दशक पहले तक यह परंपरा कस्बों में भी दिखती थी। आधुनिकीकरण, टेलीविजन और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव से यह धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। आज की युवा पीढ़ी के अनेक बच्चों को मामुलिया के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे दौर में नन्हीं बालिकाओं द्वारा इसे निभाना सराहनीय पहल है। नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से परिचित कराना आवश्यक है।