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रोटियां कमाने के लिए घर छोड़ा था और अब अपनों तक पहुंचने को संघर्ष कर रहे श्रमिक

Fri, 15 May 2020 01:03 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 15 May 2020 01:03 AM IST
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lock down - फोटो : AGRA
झांसी। रोटी कमाने को घर छोड़ा था इन्होंने। लेकिन अब अपनों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। श्रमिक वाकई आज संकट में हैं। भूखे पेट, नंगे पैर चले जा रहे हैं अपने घरों को। सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल ही पूरा कर रहे हैं। झांसी को आने वाले रास्तों पर पैदल चलने वाले मजदूरों की भीड़ सरकार के इंतजामों की पोल खोल रही है। कोई ट्रक में बैठकर आ रहा है तो कोई प्राइवेट टैक्सी में। अगर आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पिछले पांच दिनों में करीब एक लाख मजदूर यहां से विभिन्न इलाकों के लिए रवाना हो चुके हैं। बृहस्पतिवार को भी सिलसिला बदस्तूर जारी रहा।
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गोद में भूख से बिलखते बच्चे, थक कर साथ चलने में असमर्थ हुए परिजन। साइकिल, ट्रक, टैंकर, टेंपो, आपे या फिर जमा पूंजी खर्च कर महंगी टैक्सी, वे तो बस घर पहुंचना चाह रहे हैं। मजदूरों ने बताया कि तमाम सरकारों के मदद, खानपान उपलब्ध कराने के सभी दावे खोखले साबित हुए हैं। झांसी-ललितपुर में भी उनका नाम-पता लिख कर उन्हें आगे उनके हाल पर छोड़ दिया जा रहा है।
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टोल प्लाजा, प्रशासन और रोडवेज के विश्वस्त सूत्रों के अनुसार पिछले पांच दिनों में शिवपुरी रोड स्थित झांसी के रक्सा बॉर्डर पर 50 हजार से अधिक, दतिया रोड स्थित चिरूला बॉर्डर पर करीब बाइस हजार और ललितपुर के अमझरा बॉर्डर पर 12500 से अधिक मजदूर गुजरे हैं। इसके साथ ही पांच दिनों में झांसी के बॉर्डरों तक पैदल चलकर पहुंचे लगभग 15 हजार मजदूरों को रोडवेज बसों के माध्यम से उनके गृह जनपदों तक पहुंचा दिया। भूखे-प्यासे ये मजदूर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर चुके थे। आगे भी लंबा सफर तय करना था।
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15 हजार मजदूर तो पैदल चलकर आ चुके
पिछले पांच दिनों में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश से आने वाले करीब 15 हजार मजदूरों को रोडवेज बसों द्वारा प्रदेश के कोने-कोने में पहुंचाया गया है। ये मजदूर प्रयागराज, कानपुर, सिद्धार्थनगर, बहराइच, बस्ती, बनारस, गोरखपुर, आजमगढ़, लखनऊ, देवरिया, बलरामपुर, कुशीनगर, फैजाबाद, चंदौली, जैनपु, सुल्तानपुर, चित्रकूट, महोबा, बलिया, मिर्जापुर, महाराजगंज, अलीगढ़, कन्नौज, कौशांबी, खलीलाबाद सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों को रवाना हुए।
दिल्ली, पंजाब, हरियाणा से आए बुंदेलखंड के मजदूर
झांसी के चिरूला बार्डर पर दिल्ली, फरीदाबाद, लुधियाना, अमृतसर, पलवल आदि शहरों से करीब बीस हजार मजदूर आए। इनमें अधिकतर बुंदेलखंड के महोबा, छतरपुर, चित्रकूट, बांदा, टीकमगढ़, राठ, हमीरपुर के थे। ये सभी अपने गांवों को रवाना हुए।
तेलंगाना, मध्यप्रदेश से भी आए
ललितपुर के अमझरा बॉर्डर पर पिछले पांच दिनों में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड से करीब 12,500 मजदूर आए। ये सभी गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, उन्नाव, फैजाबाद, गोंडा आदि जिलों के थे। सभी अपने-अपने गांव चले गए।
सामान रखने के लिए पुरानी साइकिलें खरीदीं
करन के बताया कि इंदौर के टीकरी में ईंट- भट्टा का काम करने गए थे। कुछ दिनों तक काम किया, इसके बाद वहां पर काम नहीं मिला तो वहां से पुरानी साइकिल ख़रीदी और सामान रखकर पैदल चलकर आ रहे हैं, 25 दिन हो गए हैं। जहां रात हो जाती है, वहीं पर विश्राम कर लेते हैं। सुबह से फिर चल देते हैं। पूरा परिवार साथ लेकर चल रहे हैं। घरों में ताले डालकर गए थे। बुधवार की रात में अमझरा घाटी पर आ गए। गौशाला में काफी भीड़ थी इसलिए एकांत में जंगल में पेड़ों के नीचे ठहर गए। अब गोरखपुर जाना है।
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झारखंड और बिहार वाले भटक रहे
बिहार और झारखंड वाले मजदूर बस सेवा से वंचित हैं, केवल उत्तर प्रदेश वालों की व्यवस्था की जा रही है। 24 लोग मुंबई से पैदल चलकर आ रहे हैं। बिहार के अररिया निवासी बैजनाथ राम का कहना है कि वहां पर मिस्त्री का काम करते थे, जैसे ही लॉकडाउन हो गया तो ठेकेदार ने भगा दिया। तीन तीन माह की मजदूरी नहीं दी। परेशानी उठानी पड़ रही है। दो दिन से गोशाला में ठहरे हुए हैं। बिहार और झारखंड के मजदूरों को कोई साधन नहीं है। इस कारण पैदल चल रहे हैं।

प्रतिदिन की अपेक्षा कुछ भीड़ कम है। दस बसों से पांच सौ से अधिक लोगों उनके गृह जनपद में भिजवाजा गया है। बुधवार की रात में 26 बसें रवाना हुई थीं। बिहार और झारखंड के लोगों को भिजवाजा जा रहा है।
- फूलसिंह, पुलिस क्षेत्राधिकारी पाली
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