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रोजगार को तरस गए मजदूर, सड़कों पर भटकने को मजबूर

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Thu, 30 Apr 2020 10:25 PM IST
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labour in great problem
labour - फोटो : demo
एक दौर था, जब उनके हाथ खाली नहीं होते थे। परिवार को चलाने के लिए मजदूरी के सहारे दो वक्त की रोटी की जुगाड़ होती थी, लेकिन कोरोना के कदम ने ऐसा प्रहार किया कि सब कुछ छिन गया। अब सड़क पर भटकना उनकी मजबूरी है। काम की तलाश तो नजरों से ओझल हो चुकी है। घर पर पहुंचने को पैदल चलकर मंजिल तय कर रहे हैं। सरकार सबको काम देने की बात कहकर सबको घर वापस ला रही है, लेकिन अब तक काम तो छोड़िए, मजदूरों को ठिकाना भी नहीं मिल सका है। आज मजदूरों का दिन है। लेकिन लॉकडाउन ने मजदूरों से सबकुछ छीन लिया है। आलम यह है कि  जिले में करीब चार लाख मजदूर हैं। जिसमें करीब 30 हजार मजदूर ऐसे हैं, जो बाहरी प्रदेशों से लौटकर अपने गांव आ गए हैं। उम्मीद थी कि घर पर काम मिल जाएगा, लेकिन यहां भी हाथ खाली हैं। मनरेगा की बात करें तो अब तक केवल दो हजार मजदूरों को ही काम मिला है। वहीं हजारों मजदूर ऐसे हैं, जो अपनी मंजिल की तलाश में अब तक सड़क पर भटक रहे हैं। कोई सूरत से आ रहा है, तो कोई हरियाणा से ही पैदल चलकर आया है। कभी घर का सहारा बनने के लिए उन्होंने बाहरी जिले का दामन था, लेकिन लॉकडाउन ने उनको बेसहारा बनाकर घर वापस भेज दिया। सरकार की ओर से रोज कहा जा रहा है कि मजदूरों को रोजगार मिलेगा, लेकिन अभी तक हजारों मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए जंग लड़ रहे हैं। पहले मजदूरों के लिए रोजगार पलायन की मजबूरी बना था, तो अब लॉकडाउन में बेरोजगारी ने कहीं का न छोड़ा। हालात यह हैं कि जिले में पहले से ही उद्योग धंधों का बुरा हाल है। जो मजदूर जिले में रहते हैं, उनको ही ठीक से रोजगार मुहैया नहीं हो पाता। ऐसे में बाहरी प्रदेशों से आए मजदूरों को रोजगार देना बड़ी चुनौती बन रहा है। पत्थर उद्योग भी नहीं दे सका राहत लॉकडाउन में जिले के सारे उद्योग बंद हो गए हैं। जिले में लगभग दो सौ स्टोन क्रशर संचालित हो रही हैं, लेकिन इन दिनों यहां भी तालाबंदी होने से मजदूरोें के आगे संकट खड़ा हो गया है। यहां हजारों मजदूरों को रोजगार मिलता था, लेकिन अब वह भी बंद होने से मजदूर बेरोजगार हो गए हैं।
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