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पवित्र प्रेम की रक्षा के लिए बेतवा के जल में समा गई कुमुद, छू भी नहीं सका अलीमर्दन
Fri, 12 Feb 2021 01:47 AM IST
झांसी ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
Published by: झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 12 Feb 2021 01:47 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला।
दिलीप नगर के राजा का दासी पुत्र राजकुमार कुंजर सिंह का दांगी जाति की युवती कुमुद के आत्मीय समर्पण था और कुमुद भी उसे मन ही मन प्रेम करती थी, पर इस पवित्र प्रेम को किसी की नजर लगी और सैयद नगर (सैदनगर) का मुगल सूबेदार अलीमर्दन एक खलनायक की तरह इस प्रेमगाथा के बीच आया और उसने सब कुछ तहस- नहस कर दिया। वह कुमुद को अपनी बेगम बनाना चाहता था। कई दिनों तक दांगी जाति के लोगों और अलीमर्दन की सेना के बीच युद्ध हुआ। दांगियों के सैनिक और कुंजर सिंह युद्ध के मैदान में कमजोर पड़ने लगे, तब कुमुद ने सैकड़ों लोगों की जा रही जान और अपनी आन बचाने के लिए पद्मिनी की गाथा को दोहराते हुए अपने पिता के साथ बेतवा में छलांग लगाकर आत्मबलिदान कर लिया। कुमद कुंजर की न हो सकी यह अलग बात है पर
अलीमर्दन भी उसे छू नहीं सका।
झांसी के इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि इस प्रेम गाथा पर उपन्यास सम्राट डा. वृंदावन लाला वर्मा ने विराटा की पद्मिनी के नाम से एक उपन्यास भी लिखा है। झांसी जिले के चिरगांव के पास स्थित विराटा गांव में बेतवा किनारे बना मंदिर इस पवित्र प्रेम की बलिदान गाथा का गवाह है । कुशवाहा बताते हैं कि सत्रहवीं सदी में सैयद नगर के मुगल सूबेदार अलीमर्दन का बुंदेलखंड में एरच व कालपी में शासन था। इस दौर में किसी गरीब के घर में अति सुंदर बेटी का होना ही अभिशाप था। पालर गांव के निवासी दांगी जाति के नरपति के यहां भी एक बेटी थी जिसका नाम था कुमुद। उसकी सुंदरता के सामने इंद्र की अप्सराएं भी फीकी पड़ती थीं। बेटी को सामंतों की बुरी नजर से बचाने के लिए नरपति ने पालर के ही एक मंदिर में एक तरफ सिंहासन लगाकर अपनी बेटी को बिठा दिया तथा प्रचारित कर दिया कि उसकी बेटी देवी का अवतार है। इस मंदिर पर दिलीप नगर के राजा देवी सिंह का दासी पुत्र राजकुमार कुंजर सिंह भी आता था तथा वह कुमुद से पवित्र प्रेम करता था, कुमुद भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी।
एक दिन मंदिर के बाहर कुंजर बैठा था तथा अंदर कुमुद, इसी दौरान दो मुगल सैनिक आए, उनकी नीयत ठीक न देख कुंजर ने उन्हें ललकारा तथा एक सैनिक को मौके पर ही तलवार के वार से ढेर कर दिया। खबर मिलते ही अलीमर्दन अपनी सेना के साथ तथा कुंजर के पक्ष में दिलीप नगर की सेना मैदान में आ गई। युद्ध हुआ। नरसंहार देख नरपत अपनी बेटी कुमुद को रातोंरात पालर से लेकर रामनगर घाट के पास विराटा गांव में पहुंच गया। वह यहां इसलिए सुरक्षित महसूस कर रहा था क्योंकि यहां पर उसकी दांगी जाति के ही अधिकांश लोग निवास करते थे।
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पालर में युद्ध तो शांत हो गया पर चिंगारी अभी बाकी थी। फिल्म अभिनेता राजा बुंदेल इस संबंध में बताते हैं कि पालर का युद्ध शांत होने के बाद अलीमर्दन के गुप्तचरों ने बताया हुजूर लड़की नहीं जन्नत की हूर है। उधर, अब तक दिलीप नगर की सेना कुंजर सिंह के कारण कुमुद के पक्ष में युद्ध लड़ रही थी, पर पालर के युद्ध के बाद अली मर्दन ने दिलीप नगर के राजा देवी सिंह को मोटी रकम देकर युद्ध से पीछे कर दिया तथा विराटा गांव पर हमला कर दिया।
मंदिर के अंदर बंद कुमुद की रक्षा के लिए अब दांगी जाति के लोगों के अलावा सिर्फ राजकुमार कुंजर ही लड़ रहा था। दांगी जाति के सैकड़ों लोग युद्ध में शहीद हो चुके थे, अपने पक्ष के सैकड़ों लोगों की शहादत को देख कुमुद अपने पिता के साथ मंदिर के पीछे से बह रही बेतवा की अथाह जलराशि में कूद गई, उसके पीछे से कूद गया राजकुमार कुंजर। युद्ध शांत होने पर अली मर्दन मंदिर पर पहुंचा पर वह कुमद की परछाई भी नहीं पा सका।
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अलीमर्दन भी उसे छू नहीं सका।
झांसी के इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि इस प्रेम गाथा पर उपन्यास सम्राट डा. वृंदावन लाला वर्मा ने विराटा की पद्मिनी के नाम से एक उपन्यास भी लिखा है। झांसी जिले के चिरगांव के पास स्थित विराटा गांव में बेतवा किनारे बना मंदिर इस पवित्र प्रेम की बलिदान गाथा का गवाह है । कुशवाहा बताते हैं कि सत्रहवीं सदी में सैयद नगर के मुगल सूबेदार अलीमर्दन का बुंदेलखंड में एरच व कालपी में शासन था। इस दौर में किसी गरीब के घर में अति सुंदर बेटी का होना ही अभिशाप था। पालर गांव के निवासी दांगी जाति के नरपति के यहां भी एक बेटी थी जिसका नाम था कुमुद। उसकी सुंदरता के सामने इंद्र की अप्सराएं भी फीकी पड़ती थीं। बेटी को सामंतों की बुरी नजर से बचाने के लिए नरपति ने पालर के ही एक मंदिर में एक तरफ सिंहासन लगाकर अपनी बेटी को बिठा दिया तथा प्रचारित कर दिया कि उसकी बेटी देवी का अवतार है। इस मंदिर पर दिलीप नगर के राजा देवी सिंह का दासी पुत्र राजकुमार कुंजर सिंह भी आता था तथा वह कुमुद से पवित्र प्रेम करता था, कुमुद भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी।
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एक दिन मंदिर के बाहर कुंजर बैठा था तथा अंदर कुमुद, इसी दौरान दो मुगल सैनिक आए, उनकी नीयत ठीक न देख कुंजर ने उन्हें ललकारा तथा एक सैनिक को मौके पर ही तलवार के वार से ढेर कर दिया। खबर मिलते ही अलीमर्दन अपनी सेना के साथ तथा कुंजर के पक्ष में दिलीप नगर की सेना मैदान में आ गई। युद्ध हुआ। नरसंहार देख नरपत अपनी बेटी कुमुद को रातोंरात पालर से लेकर रामनगर घाट के पास विराटा गांव में पहुंच गया। वह यहां इसलिए सुरक्षित महसूस कर रहा था क्योंकि यहां पर उसकी दांगी जाति के ही अधिकांश लोग निवास करते थे।
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पालर में युद्ध तो शांत हो गया पर चिंगारी अभी बाकी थी। फिल्म अभिनेता राजा बुंदेल इस संबंध में बताते हैं कि पालर का युद्ध शांत होने के बाद अलीमर्दन के गुप्तचरों ने बताया हुजूर लड़की नहीं जन्नत की हूर है। उधर, अब तक दिलीप नगर की सेना कुंजर सिंह के कारण कुमुद के पक्ष में युद्ध लड़ रही थी, पर पालर के युद्ध के बाद अली मर्दन ने दिलीप नगर के राजा देवी सिंह को मोटी रकम देकर युद्ध से पीछे कर दिया तथा विराटा गांव पर हमला कर दिया।
मंदिर के अंदर बंद कुमुद की रक्षा के लिए अब दांगी जाति के लोगों के अलावा सिर्फ राजकुमार कुंजर ही लड़ रहा था। दांगी जाति के सैकड़ों लोग युद्ध में शहीद हो चुके थे, अपने पक्ष के सैकड़ों लोगों की शहादत को देख कुमुद अपने पिता के साथ मंदिर के पीछे से बह रही बेतवा की अथाह जलराशि में कूद गई, उसके पीछे से कूद गया राजकुमार कुंजर। युद्ध शांत होने पर अली मर्दन मंदिर पर पहुंचा पर वह कुमद की परछाई भी नहीं पा सका।