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बिक्री घटने और उत्पादन लागत बढ़ने से खादी संकट में, कर्मचारियों को वेतन के लाले

Thu, 30 Sep 2021 01:36 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 30 Sep 2021 01:36 AM IST
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Khadi is in crisis due to decrease in sales and increase in cost of production, workers need salary
झांसी। आजादी के आंदोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भावनाओं से जुड़ी खादी आज बिक्री घटने और उत्पादन लागत बढ़ने से बदहाल है। खादी भंडारों के आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं, आलम यह है कि कर्मचारियों के वेतन के लाले पड़ रहे हैं।
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स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर उस दौर में हाथ से काते हुए सूत और हथकरघा पर बनाए गए खादी कपड़े पहनने का आह्वान किया था। उस समय लोगों ने स्वदेशी का नारा देकर खादी को हाथोंहाथ लिया था। देश स्वतंत्र होने के बाद सरकार ने सूत कातकर हथकरघा पर खादी बनाने वाले बुनकरों को प्रोत्साहित करने के लिए शहर तथा कसबों में श्री गांधी आश्रम खादी भंडार शुरू किए। करीब दस साल पहले तक यानी 2011 तक इन खादी भंडारों की बिक्री काफी अच्छी रही पर इसके बाद लोगों का खादी से रुझान कम होने के कारण लगातार बिक्री में गिरावट आती रही। कोराना के बाद तो स्थिति यह आ गई कि खादी की बिक्री में साठ फीसदी की कमी आ गई। हालात ऐसे हैं कि बिक्री न होने से कई भंडारों पर छह-छह माह से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा है। सिर्फ बिजली और भवन का किराया ही बमुश्किल निकल पा रहा है। झांसी जिले में दो अलग-अलग बुनकर समूहों की खादी बेची जाती है। कुल आठ भंडार में चार जैतपुर समूह के हैं, जबकि चार झांसी जिले के समूह के हैं।
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चरखा और हथकरघा तोड़ रहे दम, बदहाल है खादी
जैतपुर समूह के झांसी के खादी भंडारों के सहायक व्यवस्थापक चतुर सिंह यादव का कहना है कि श्री गांधी आश्रम खादी भंडार पर काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन की निर्भरता बिक्री पर है, अगर अच्छी बिक्री हो रही है तो हर माह वेतन मिलता है और अगर बिक्री नहीं हो रही है तो जब बिक्री अच्छी होने लगती है तभी एक साथ कई महीनों की वेतन कर्मचारियों को दी जाती है। उन्होंने बताया कि पिछले दस साल में लोगों का खादी की तरफ से रुझान घटा है। बिक्री में करीब साठ फीसदी की गिरावट आई है। बिक्री घटने से उत्पादन पर असर आया और गुणवत्ता और कीमत दोनों प्रभावित हो गई। आज के दौर में कई बड़ी कपड़ा मिलें खादी की नकल करके कपड़ा बेच रहीं हैं। एक बड़ी कपड़ा मिल में मशीन से एक थान यानी 11 मीटर कपड़ा एक घंटे में बनकर तैयार हो जाता है जबकि यही 11 मीटर का एक थान जब हमारे यहां बुनकर तकली पर पहले धागा कातता है फिर हाथकरघा पर उससे कपड़ा बनाता है तो उसे एक सप्ताह लग जाता है। ऐसे में लागत के हिसाब से रेट में अंतर आने से खादी दूसरे कपड़ों से पिछड़ती चली गई। बुनकरों की मजदूरी धीरे-धीरे कम होती चली गई । यादव बताते हैं कि बिक्री कम होने से उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ा तथा परिणाम स्वरूप जिन उत्पादन सेंटरों पर दो हजार बुनकर काम करते थे वहां बमुश्किल दो सौ की संख्या बची है। अस्सी फीसदी बुनकर दूसरे व्यवसाय में चले गए हैं। यादव ने बताया कि झांसी के डा. दयासागर कंपाउंड के खादी भंडार में बीते कुछ साल तक बीस लाख रु पये सालाना की बिक्री हो जाती थी अब यह घटकर दस से पंद्रह लाख हो गई है। इस तरह हथकरघा से खादी बनाने के प्रमुख केंद्रों में जैतपुर के अलावा झांसी जिले की मऊरानीपुर, कटेरा, टहरौली समेत कुछ अन्य गांवों में हथकरघा से खादी बनाई जाती है, पर बिक्री घट जाने के बाद इन खादी भंडारों पर कपड़े की मांग भी घट गई, जिससे बुनकर पलायन को मजबूर हो गए।
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अब तो कंबल और रजाई की बिक्री भी हुई प्रभावित
मानिक चौक के खादी भंडार पर काम करने वाले कर्मचारी जटाशंकर पाठक बताते हैं कि महात्मा गांधी ने कहा था कि खादी वस्त्र नहीं एक विचार है। खादी में गिरावट इस बात का संकेत देती है कि कहीं न कहीं देश प्रेम और संस्कृति के प्रति हमारे विचारों में गिरावट आई है। आज हम महात्मा गांधी के स्वदेशी के नारे को दरकिनार कर विदेशी सभ्यता और पहनावे की ओर जा रहे हैं, इस कारण खादी पिछड़ रही है। खादी भंडार पर कपड़े के अलावा रजाई गद्दा और कंबल की खासी बिक्री थी, पर बाजार में हल्के वजन वाले कंबल आने के बाद रजाई और गद्दों की बिक्री एकदम नीचे आ गई है। झांसी में मानिक चौक, डा. दयासागर कंपाउंड , सराफा बाजार, तहसील के पास गांधी भवन में नंबर एक व दो ,सैंयर गेट, सदर बाजार, इलाइट चौैराहा पर मिलाकर कुल आठ खादी भंडार संचालित हैं इन सभी की कमोवेश यही स्थिति है।
मटका को झटका, सिल्क का भी बाजार घटा
किसी जमाने में खादी का मचका का कपड़ा बड़े राजनेता और रसूख वाले लोगों की शान हुआ करता था पर इस कपड़े की मांग भी बाजार में कम हो गई है, खादी की सिल्क की चमक भी अब ग्राहकों को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पा रही है। आठ खादी भंडारों की सालाना 80 से 90 लाख की बिक्री अब 40 से 45 लाख तक सिमट गई है।

तुलनात्मक सारिणी
श्री गांधी आश्रम खादी भंडार की बिक्री- 2011 2021
झांसी के आठों खादी भंडार में 80 से 90 लाख रुपये सालाना की बिक्री होती थी 40 से 45 लाख रुपये तक सालाना बिक्री
मऊरानीपुर, कटेरा, टहरौली, रानीपुर में दो हजार हथकरघा बुनकर थे दो सौ से ढाई सौ बुनकर ही चला रहे हथकरघा
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