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आखिर क्या लिखा है इन 43 वसीयतों में..
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झांसी। निबंधन विभाग के दफ्तर की एक अलमारी में 43 वसीयतें ऐसी रखी हुई हैं, जो दशकों से अपने वारिसों का इंतजार कर रही हैं। लेकिन, न वारिसों का पता है और न ही वसीयत के गवाहों का। ऐसे में इन्हें खोला नहीं जा पा रहा है। इन दिनों पूरे महकमे में चर्चा है कि आखिर इन वसीयतों में लिखा क्या है। कैसे इनके वारिस को इस बारे में पता चलेगा।
किसी भी व्यक्ति की वसीयत उसका महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है, जो उसके व्यक्ति के न रहने पर उसके परिजनों में संपत्ति और जिम्मेदारियों का बंटवारा करती है। तीन दशक पहले तक ज्यादातर लोग अपनी वसीयत सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत नहीं कराते थे। बल्कि, वे दो गवाहों की मौजूदगी में अपनी वसीयत लिखकर एक लिफाफे में बंद कर निबंधन विभाग के कार्यालय में जमा कर देते थे। यहां वसीयत में क्या लिखा है, ये नहीं देखा जाता था, इसे पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता था।
बस लिफाफे को सरकारी अभिलेखों में दर्ज कर लिया जाता था। वसीयत लिखने वाले शख्स की मृत्यु के बाद ये खोली जाती थी, जिसे पंजीकृत कर दिया था। इसी वसीयत के आधार पर संपत्ति का मृतक के परिजनों में बंटवारा होता था। लेकिन, निबंधन विभाग में 43 ऐसी वसीयत जमा हैं, जो तीन दशक से ज्यादा पुरानी हैं और उन्हें खोलने अब तक कोई नहीं आया। ऐसे में ये वसीयत सालों से अपने वारिसों का इंतजार कर रही हैं।
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गोपनीय होती थी वसीयत
झांसी। वसीयत लिखने वाले इसमें पूरी गोपनीयता बरतते थे। वसीयत की जानकारी सिर्फ गवाहों को होती थी, इसमें उनके दस्तखत भी होते थे। वसीयत में गोपनीयता इसलिए रखी जाती थी, ताकि वसीयत लिखने वाले शख्स के जीवित रहते हुए उसके आश्रित संपत्ति को लेकर आपस में झगड़ा न करने लगें। मृत्यु के बाद वसीयत में लिखी हर बात अक्षरश: पंजीकृत हो जाती है, जिससे पालन करना नियमानुसार सभी के लिए जरूरी होता है। वसीयत लिखने वाले की मृत्यु के बाद गवाहों की मौजूदगी में अधिवक्ता द्वारा वसीयत उसके परिजनों को पढ़कर सुनाए जाने का प्रावधान है।
पहले लोग बंद वसीयत रख जाते थे, लेकिन अब वसीयत सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराई जाती है। पंजीकृत वसीयत ही मान्य होती है।
- राम अक्षयवर चौहान, अपर जिलाधिकारी
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किसी भी व्यक्ति की वसीयत उसका महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है, जो उसके व्यक्ति के न रहने पर उसके परिजनों में संपत्ति और जिम्मेदारियों का बंटवारा करती है। तीन दशक पहले तक ज्यादातर लोग अपनी वसीयत सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत नहीं कराते थे। बल्कि, वे दो गवाहों की मौजूदगी में अपनी वसीयत लिखकर एक लिफाफे में बंद कर निबंधन विभाग के कार्यालय में जमा कर देते थे। यहां वसीयत में क्या लिखा है, ये नहीं देखा जाता था, इसे पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता था।
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बस लिफाफे को सरकारी अभिलेखों में दर्ज कर लिया जाता था। वसीयत लिखने वाले शख्स की मृत्यु के बाद ये खोली जाती थी, जिसे पंजीकृत कर दिया था। इसी वसीयत के आधार पर संपत्ति का मृतक के परिजनों में बंटवारा होता था। लेकिन, निबंधन विभाग में 43 ऐसी वसीयत जमा हैं, जो तीन दशक से ज्यादा पुरानी हैं और उन्हें खोलने अब तक कोई नहीं आया। ऐसे में ये वसीयत सालों से अपने वारिसों का इंतजार कर रही हैं।
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गोपनीय होती थी वसीयत
झांसी। वसीयत लिखने वाले इसमें पूरी गोपनीयता बरतते थे। वसीयत की जानकारी सिर्फ गवाहों को होती थी, इसमें उनके दस्तखत भी होते थे। वसीयत में गोपनीयता इसलिए रखी जाती थी, ताकि वसीयत लिखने वाले शख्स के जीवित रहते हुए उसके आश्रित संपत्ति को लेकर आपस में झगड़ा न करने लगें। मृत्यु के बाद वसीयत में लिखी हर बात अक्षरश: पंजीकृत हो जाती है, जिससे पालन करना नियमानुसार सभी के लिए जरूरी होता है। वसीयत लिखने वाले की मृत्यु के बाद गवाहों की मौजूदगी में अधिवक्ता द्वारा वसीयत उसके परिजनों को पढ़कर सुनाए जाने का प्रावधान है।
पहले लोग बंद वसीयत रख जाते थे, लेकिन अब वसीयत सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराई जाती है। पंजीकृत वसीयत ही मान्य होती है।
- राम अक्षयवर चौहान, अपर जिलाधिकारी