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दर्जनों अच्छे खिलौनों में टूटी कार से खेलता था तो कोई महीनों बस एक चित्र बनाता रहा

Sat, 02 Apr 2022 12:54 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 02 Apr 2022 12:54 AM IST
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He used to play with a broken car in dozens of good toys, so some kept drawing just one picture for months.
झांसी। दर्जनों अच्छे खिलौने होने के बावजूद दो साल के बच्चे को सिर्फ एक टूटी कार ही पसंद आती थी। दिन भर वो उससे खेलता था। परिजन नए खिलौने लाकर देते, जो उसे पसंद ही नहीं आते। वहीं, एक बच्चा तो महीनों तक एक सा चित्र बनाता रहा। बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाने पर पता चला कि वो ऑटिज्म का शिकार हैं। ये मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है, जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है।
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इस तरह के एक नहीं बल्कि हर साल 100 से भी ज्यादा बच्चे मेडिकल कॉलेज पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इन बच्चों को अलग-अलग थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाएं देकर ठीक किया जा सकता है। बशर्ते उनका समय पर इलाज शुरू हो जाए। परिजन शुरूआत में समझ ही नहीं पाते हैं कि उनका बच्चा ऑटिज्म का शिकार है। इससे ग्रसित बच्चे किसी से आई कांटेक्ट नहीं करते। समय से बोलना शुरू नहीं करते। नाम से बुलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। एक ही काम या गतिविधि को बार-बार दोहराते हैं। खास बात ये है कि पेंटिंग और खेलकूद जैसे चीजों में ये अच्छे हो सकते हैं। मगर एक बार जो शब्द बोलना शुरू किया, उसे लगातार दोहराते रहते हैं। दौड़ने शुरू किया तो काफी देर तक रुकते ही नहीं हैं। समय पर इलाज नहीं हुआ तो बच्चे में आगे चलकर सुसाइडल डिस्ऑर्डर (आत्मघाती विकार) हो सकता है।
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हर दस हजार में 23 होते शिकार
विशेषज्ञों के मुताबिक हर दस हजार में 23 बच्चे ऑटिज्म बीमारी का शिकार होते हैं। ये बीमारी क्यों होती है, इसका अब तक कोई कारण पता नहीं चल पाया है। इन बच्चों को मंदबुद्धि नहीं कहा जा सकता है।
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अब ज्यादा बच्चों को नहीं करना पड़ेगा रेफर
मेडिकल कॉलेज में डीईआईसी सेंटर बन रहा है। अभी काफी बच्चों को विभिन्न थेरेपी के लिए दूसरे शहर रेफर करना पड़ता है। ये सेंटर इसी साल शुरू हो जाएगा। इसके बाद यहां पर नाक, कान, आंख समेत दर्जनों जांचें हो सकेंगी। साथ ही बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी, फिजियोथैरेपी आदि भी होगी।
परिजन इन बातों का रखें ध्यान
- बच्चे के साथ समय बिताएं
- सामान्य बच्चों के साथ बच्चे का मेलजोल बढ़ाएं
- रिश्तेदारों से बीमारी छिपाएं नहीं
- बच्चे को अकेला न छोड़ें
- बीमारी समय पर पहचान इलाज कराएं
साथ में ये दिक्कत भी हो सकती
- 40 फीसदी में बौद्धिक अक्षमता
- 30 फीसदी अति सक्रिय हो सकते
- 50 फीसदी में स्लीप डिस्ऑर्डर
- 12-15 फीसदी को डिप्रेशन हो सकता
- 10-12 फीसदी में सुसाइडल डिस्ऑर्डर हो सकता
ऑटिज्म बीमारी से ग्रसित बच्चे न तो अपनी बात किसी से कह पाते हैं और न दूसरों की समझ पाते हैं। मेडिकल कॉलेज में हर महीने आठ से दस मरीज आते हैं। इनको अलग-अलग थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाएं देकर काफी हद तक सही किया जा सकता है। बस समय से इलाज शुरू हो जाए। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।

दो से तीन साल में इन बच्चों का इलाज शुरू होने पर ऑटिज्म से बहुत हद तक ठीक किया जा सकता है। इसमें परिजनों का रोल भी काफी अहम होता है। उन्हें भी बच्चों के साथ काफी मेहनत करती पड़ती है। ऐसे में परिजन बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखें। ऑटिज्म के लक्षण दिखें तो डॉक्टर से संपर्क करें। - डॉ. आराधना कनकने, बाल रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज।
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