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फिरोज कर रहे मां दुर्गा का अद्भुत शृंगार..सेवा में चार पीढ़ियों से जुड़ा मुस्लिम परिवार
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झांसी। अलग-अलग शहरों में हिंदू देवी-देवताओं के लिए पोशाकें और साज-सज्जा की सामग्री तैयार करने वाले मुस्लिम परिवार तो आपने बहुत देखे होंगे। लेकिन झांसी में एक मुस्लिम परिवार ऐसा भी है जो तीन-चार पीढ़ियों से मां दुर्गा, महाकाली, श्रीगणेश और देवी-देवताओं का सुंदर शृंगार करने के लिए पहचाना जाता है। नवरात्रि में मां दुर्गा और महाकाली की मूर्तियों का शृंगार करने में लगे इस परिवार के चौथी पीढ़ी के फिरोज बताते हैं कि माता का शृंगार करने में मन को बड़ा सुकून मिलता है। वह कहते हैं कि इस काम में उनका मन ऐसा रम गया है कि कोई उन्हें महीने के लाख रुपये भी दे, तो भी वह इस काम को कभी नहीं छोड़ सकते।
झांसी शहर में तीन-चार पीढ़ियों से मां दुर्गा, भगवान श्रीगणेश और हिंदू देवी-देवताओं के शृंगार में लगे फिरोज बिसाती बाजार में परिवार के साथ रहते हैं। फिरोज बताते हैं कि उनके दादा पूजा के लिए मूर्तियों का शृंगार करते थे। इसके बाद उनके अब्बा (पिताजी) बाबू खां ने इसी काम को अपनाया। अब्बा जब मूर्तियों का शृंगार करते थे तो उसी में डूब से जाते थे। बचपन में वह अब्बा के साथ शृंगार करने जाते थे तो शृंगार के समय माता दुर्गा को कभी चूड़ियां पहनाते थे तो कभी उनकी चुनरी सजाते थे। मां की मूर्ति देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। बचपन में गणपति बप्पा के शृंगार के दौरान जब भी ढोल बजते थे तो वह भी दूसरे बच्चों के साथ नाचने लगते थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने अब्बा से शृंगार की बारीकियां सीखीं। अब्बा बाबू खां के न रहने के बाद उन्होंने पूरी तरह से अपने आप को इस काम में रमा लिया।
फिरोज बताते हैं कि देवी-देवताओं के शृंगार के अलावा वे शुभ कार्यों और शादी ब्याह के लिए पगड़ी भी तैयार करते हैं। इसके लिए उन्होंने कई कारीगर भी लगा रखे हैं। लेकिन माता और श्रीगणेश की पगड़ी वह स्वयं ही तैयार करते हैं। पूरा शृंगार भी वह अकेले ही करते हैं।
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सावन, गणेश पूजा, और नवरात्रि भर मांसाहार को हाथ तक नहीं लगाते
झांसी। फिरोज बताते हैं कि मूर्तियों का शृंगार करने के साथ-साथ वे सात्विक आचार और हिंदू रीति-रिवाजों का पूरा पालन करते हैं। शृंगार के दौरान पैरों में चप्पल नहीं पहनते हैं। इसके अलावा सावन, गणेश पूजा और नवरात्र के दौरान मांसाहार को हाथ तक नहीं लगाते हैं। घर में पत्नी, बच्चे भी इसका पालन करते हैं।
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झांसी शहर में तीन-चार पीढ़ियों से मां दुर्गा, भगवान श्रीगणेश और हिंदू देवी-देवताओं के शृंगार में लगे फिरोज बिसाती बाजार में परिवार के साथ रहते हैं। फिरोज बताते हैं कि उनके दादा पूजा के लिए मूर्तियों का शृंगार करते थे। इसके बाद उनके अब्बा (पिताजी) बाबू खां ने इसी काम को अपनाया। अब्बा जब मूर्तियों का शृंगार करते थे तो उसी में डूब से जाते थे। बचपन में वह अब्बा के साथ शृंगार करने जाते थे तो शृंगार के समय माता दुर्गा को कभी चूड़ियां पहनाते थे तो कभी उनकी चुनरी सजाते थे। मां की मूर्ति देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। बचपन में गणपति बप्पा के शृंगार के दौरान जब भी ढोल बजते थे तो वह भी दूसरे बच्चों के साथ नाचने लगते थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने अब्बा से शृंगार की बारीकियां सीखीं। अब्बा बाबू खां के न रहने के बाद उन्होंने पूरी तरह से अपने आप को इस काम में रमा लिया।
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फिरोज बताते हैं कि देवी-देवताओं के शृंगार के अलावा वे शुभ कार्यों और शादी ब्याह के लिए पगड़ी भी तैयार करते हैं। इसके लिए उन्होंने कई कारीगर भी लगा रखे हैं। लेकिन माता और श्रीगणेश की पगड़ी वह स्वयं ही तैयार करते हैं। पूरा शृंगार भी वह अकेले ही करते हैं।
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सावन, गणेश पूजा, और नवरात्रि भर मांसाहार को हाथ तक नहीं लगाते
झांसी। फिरोज बताते हैं कि मूर्तियों का शृंगार करने के साथ-साथ वे सात्विक आचार और हिंदू रीति-रिवाजों का पूरा पालन करते हैं। शृंगार के दौरान पैरों में चप्पल नहीं पहनते हैं। इसके अलावा सावन, गणेश पूजा और नवरात्र के दौरान मांसाहार को हाथ तक नहीं लगाते हैं। घर में पत्नी, बच्चे भी इसका पालन करते हैं।