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खेल से जो मिला, उसे खिलाड़ियों को दें पूर्व हॉकी खिलाड़ी : प्रीतम सिवाच
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। किसी खेल में अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर उपलब्धि हासिल करने के बाद नामचीन खिलाड़ी मैदान से दूर हो जाते हैं। केवल उपलब्धि हासिल कर लेना ही सब कुछ नहीं है। बल्कि हम पूर्व हॉकी खिलाड़ियाें की जिम्मेदारी बनती है कि जो हमें अच्छा खेलकर हासिल हुआ है, उसे नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के साथ साझा करें। ये बात शनिवार को झांसी आई भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान प्रीतम रानी सिवाच ने अमर उजाला से बातचीत में कही।
झांसी के ध्यानचंद स्टेडियम में चल रही अखिल भारतीय प्राइजमनी महिला हॉकी प्रतियोगिता में शिरकत कर उन्हाेंने देशभर से आईं हॉकी खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया। प्रीतम रानी सिवाच ने कहा कि हॉकी में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आए हैं। खिलाड़ियों को नौकरी मिल रही है। सुविधाओं में इजाफा हो रहा है। आधुनिक मैदान बन रहे हैं। मगर अभी भी काफी काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अधिकांश पूर्व हॉकी खिलाड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद अपने अन्य कामों में लग जाते हैं, लेकिन उनको मैदान पर लौटने की जरूरत है। प्रीतम ने कहा कि सरकार खेलों को बढ़ावा दे रही है। हॉकी इंडिया भी नए-नए टूर्नामेंट करा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाओं का अभाव है। झांसी में ही हमने देखा कि ऐसी तमाम खिलाड़ी इस टूर्नामेंट में आई हैं, जिन्होंने एस्ट्रोटर्फ को छूकर देखा है। हॉकी के प्रति बेटियों में रुझान बढ़ा है। जरूरत है कि हॉकी खिलाड़ियों का नौकरियों में कोटा बढ़ाया जाए।
भारतीय टीम में विदेशी कोच की नियुक्ति के सवाल पर उन्होंने कहा कि विदेशी कोच इसलिए नियुक्त किए जाते हैं कि उनको अनुभव ज्यादा होता है। मगर यह भी जरूरी है कि सहायक कोच के तौर पर राष्ट्रीय टीमों में पूर्व भारतीय खिलाड़ियों को मौका दिया जाए। ताकि वे जमीनी स्तर पर टीम को मजबूती और अपने अनुभव दे सकें। उन्होंने कहा कि झांसी आकर गर्व होता है। मेजर ध्यानचंद से उनको प्रेरणा मिलती है। महिला हॉकी के राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट होते रहने चाहिए।
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कॉमनवेल्थ खेलों में देश को स्वर्ण पदक दिलाने का गौरव
पूर्व हॉकी खिलाड़ी प्रीतम रानी सिवाच ने महिला हॉकी को ऊंचाई तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्हें 1992 में जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब मिला। 1998 में उन्होंने एशियाड में कप्तानी करते हुए 15 साल बाद प्रतियोगिता का रजत पदक जीता। 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2002 में मैनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक दिलाया। 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रशिक्षक बनीं। चाइना में एशियन गेम व अर्जेंटीना में हुए विश्व कप में टीम को प्रशिक्षण दिया। 2017 में एशिया कप स्वर्ण पदक विजेता टीम को प्रशिक्षण दिया। वर्ष 2021 में हॉकी में द्रोणाचार्य अवॉर्ड प्राप्त करने वाली देश की पहली महिला कोच बनीं।
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झांसी। किसी खेल में अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर उपलब्धि हासिल करने के बाद नामचीन खिलाड़ी मैदान से दूर हो जाते हैं। केवल उपलब्धि हासिल कर लेना ही सब कुछ नहीं है। बल्कि हम पूर्व हॉकी खिलाड़ियाें की जिम्मेदारी बनती है कि जो हमें अच्छा खेलकर हासिल हुआ है, उसे नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के साथ साझा करें। ये बात शनिवार को झांसी आई भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान प्रीतम रानी सिवाच ने अमर उजाला से बातचीत में कही।
झांसी के ध्यानचंद स्टेडियम में चल रही अखिल भारतीय प्राइजमनी महिला हॉकी प्रतियोगिता में शिरकत कर उन्हाेंने देशभर से आईं हॉकी खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया। प्रीतम रानी सिवाच ने कहा कि हॉकी में पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आए हैं। खिलाड़ियों को नौकरी मिल रही है। सुविधाओं में इजाफा हो रहा है। आधुनिक मैदान बन रहे हैं। मगर अभी भी काफी काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अधिकांश पूर्व हॉकी खिलाड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद अपने अन्य कामों में लग जाते हैं, लेकिन उनको मैदान पर लौटने की जरूरत है। प्रीतम ने कहा कि सरकार खेलों को बढ़ावा दे रही है। हॉकी इंडिया भी नए-नए टूर्नामेंट करा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाओं का अभाव है। झांसी में ही हमने देखा कि ऐसी तमाम खिलाड़ी इस टूर्नामेंट में आई हैं, जिन्होंने एस्ट्रोटर्फ को छूकर देखा है। हॉकी के प्रति बेटियों में रुझान बढ़ा है। जरूरत है कि हॉकी खिलाड़ियों का नौकरियों में कोटा बढ़ाया जाए।
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भारतीय टीम में विदेशी कोच की नियुक्ति के सवाल पर उन्होंने कहा कि विदेशी कोच इसलिए नियुक्त किए जाते हैं कि उनको अनुभव ज्यादा होता है। मगर यह भी जरूरी है कि सहायक कोच के तौर पर राष्ट्रीय टीमों में पूर्व भारतीय खिलाड़ियों को मौका दिया जाए। ताकि वे जमीनी स्तर पर टीम को मजबूती और अपने अनुभव दे सकें। उन्होंने कहा कि झांसी आकर गर्व होता है। मेजर ध्यानचंद से उनको प्रेरणा मिलती है। महिला हॉकी के राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट होते रहने चाहिए।
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कॉमनवेल्थ खेलों में देश को स्वर्ण पदक दिलाने का गौरव
पूर्व हॉकी खिलाड़ी प्रीतम रानी सिवाच ने महिला हॉकी को ऊंचाई तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्हें 1992 में जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब मिला। 1998 में उन्होंने एशियाड में कप्तानी करते हुए 15 साल बाद प्रतियोगिता का रजत पदक जीता। 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2002 में मैनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक दिलाया। 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रशिक्षक बनीं। चाइना में एशियन गेम व अर्जेंटीना में हुए विश्व कप में टीम को प्रशिक्षण दिया। 2017 में एशिया कप स्वर्ण पदक विजेता टीम को प्रशिक्षण दिया। वर्ष 2021 में हॉकी में द्रोणाचार्य अवॉर्ड प्राप्त करने वाली देश की पहली महिला कोच बनीं।