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... बच्चियों से भी छिना पिता का साया
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झांसी। ललितपुर के मड़ावरा के ग्राम धुरवारा में चौथी बेटी का जन्म होने पर एक पिता के आत्महत्या कर लेने की घटना को महिलाओं ने समाज के लिए बेहद दुखद बताया है। उनका कहना है कि इस घटना ने साबित कर दिया है कि आज भी बेटा- बेटी में कितना भेद किया जाता है? बेटी के जन्म पर पिता ने जो कदम उठाया। उससे पूरा परिवार अनाथ हो गया है। बाकी बच्चियों से भी पिता का साया छिन गया है।
बेटा- बेटी में आज कोई फर्क नहीं रहा है। बेटी के जन्म पर आत्महत्या करना बेहद कायरता पूर्ण निर्णय है। ये कदम उठाने से पूर्व उनको सोचना चाहिए था कि कितना बड़ा परिवार उनसे जुड़ा है। निश्चय ही बड़े होकर बेटियां उनका नाम करती।
सीमा राजपूत।
बेटी के जन्म पर आत्महत्या करना बिलकुल गलत है। अगर उनको बेटी नहीं चाहिए थी तो वे किसी दूसरे किसी जरूरतमंद दंपती को दे सकते थे। अनाथालय में दी जा सकती थी। उनके एक कदम ने पूरे परिवार के आगे के जीवन को कठिन बना दिया है।
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रेखा राठौर।
यह जल्दबाजी में उठाया गया कदम है। लोगों के दिमाग में आज भी बैठा हुआ है कि बेटी होना अभिशाप है। जबकि उन्हें समझना चाहिए कि आज के दौर में बुढ़ापे का सहारा बेटों की जगह बेटियां बन रहीं हैं। बेटे तो माता- पिता को घर से बाहर निकाल रहे हैं।
वंदना अग्रवाल।
बेटी के जन्म लेने पर एक पिता द्वारा आत्महत्या करना पूरे समाज के लिए बेहद दुखद है। इस घटना ने हमको बताया दिया है कि गांव- देहात में आज भी बेटों के जन्म पर खुशियां मनाईं जातीं हैं। यह घटना पूरे समाज को झकझोरने वाली है।
अनामिका वर्मा।
सरकार बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने के तमाम योजनाएं संचालित कर रही है। जरूरतमंद परिवारों के लिए अब बेटियों का पालना इतना मुसीबत भरा नहीं रह गया है। अगर ये कदम उठाने से पूर्व वह दूसरों से सलाह मशविरा करता तो उसके निश्चय की विचार बदल जाते।
दीपा छावड़ा ।
यह कदम उठाने से पहले उस व्यक्ति को सोचना चाहिए था कि उसके जाने के बाद पत्नी व बच्चियों का क्या होगा? वह जब तीन बच्चियों की परवरिश कर रहा था तो चौथी की भी कर सकता है। आत्महत्या करना कोई हल नहीं है।
संध्या सक्सेना।
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बेटा- बेटी में आज कोई फर्क नहीं रहा है। बेटी के जन्म पर आत्महत्या करना बेहद कायरता पूर्ण निर्णय है। ये कदम उठाने से पूर्व उनको सोचना चाहिए था कि कितना बड़ा परिवार उनसे जुड़ा है। निश्चय ही बड़े होकर बेटियां उनका नाम करती।
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सीमा राजपूत।
बेटी के जन्म पर आत्महत्या करना बिलकुल गलत है। अगर उनको बेटी नहीं चाहिए थी तो वे किसी दूसरे किसी जरूरतमंद दंपती को दे सकते थे। अनाथालय में दी जा सकती थी। उनके एक कदम ने पूरे परिवार के आगे के जीवन को कठिन बना दिया है।
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यह जल्दबाजी में उठाया गया कदम है। लोगों के दिमाग में आज भी बैठा हुआ है कि बेटी होना अभिशाप है। जबकि उन्हें समझना चाहिए कि आज के दौर में बुढ़ापे का सहारा बेटों की जगह बेटियां बन रहीं हैं। बेटे तो माता- पिता को घर से बाहर निकाल रहे हैं।
वंदना अग्रवाल।
बेटी के जन्म लेने पर एक पिता द्वारा आत्महत्या करना पूरे समाज के लिए बेहद दुखद है। इस घटना ने हमको बताया दिया है कि गांव- देहात में आज भी बेटों के जन्म पर खुशियां मनाईं जातीं हैं। यह घटना पूरे समाज को झकझोरने वाली है।
अनामिका वर्मा।
सरकार बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने के तमाम योजनाएं संचालित कर रही है। जरूरतमंद परिवारों के लिए अब बेटियों का पालना इतना मुसीबत भरा नहीं रह गया है। अगर ये कदम उठाने से पूर्व वह दूसरों से सलाह मशविरा करता तो उसके निश्चय की विचार बदल जाते।
दीपा छावड़ा ।
यह कदम उठाने से पहले उस व्यक्ति को सोचना चाहिए था कि उसके जाने के बाद पत्नी व बच्चियों का क्या होगा? वह जब तीन बच्चियों की परवरिश कर रहा था तो चौथी की भी कर सकता है। आत्महत्या करना कोई हल नहीं है।
संध्या सक्सेना।