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Jhansi News: किसान नारियल के जूट में तैयार कर सकेंगे पौध, मिट्टी नहीं बनेगी अवरोध

Mon, 11 Dec 2023 12:32 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 11 Dec 2023 12:32 AM IST
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Farmers will be able to grow saplings in coconut jute, soil will not become a hindrance
कोकोपीट तकनीकी पर काम कर रहा केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय
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शोध के दौरान एक घंटे में 80 हजार पौधे रोप रही सीडर मशीन
प्रयोग सफल होने पर 2024 में किसानों को मिल सकेगा तकनीक का लाभ
संवाद न्यूज एजेंसी

झांसी। बुंदेलखंड के किसान खेती के लिए मिट्टी पर ही निर्भर हैं, अक्सर मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने से फसल खराब हो जाती है। ऐसे में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय यहां के किसानों के लिए मिट्टी की बजाए नारियल के जूट (कोकोपीट) में पौधों को विकसित करने की तकनीक तैयार कर रहा है। इस तकनीक से पौधों में मिट्टी से लगने वाले जीवाणु भी दूर रहेंगे। वैज्ञानिकों की मानें तो प्रयोग सफल होने पर मार्च 2024 तक यह तकनीक किसानों तक पहुंचाई जाएगी। इस तकनीक पर शोध जारी है।
केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने बुंदेलखंड के किसानों को आधुनिक खेती की ओर मोड़ने के लिए अब तकनीक का सहारा लिया है। विश्वविद्यालय ने यूरोप की तर्ज पर नर्सरी में पौधों को पैदा करने के लिए मिट्टी के स्थान पर कोकोपीट को अपनाया है। इस प्रोजेक्ट को पंख देने के लिए यहां सीडर मशीन लाई गई है। इस मशीन से एक घंटे में 80 हजार पौधे रोपे जा सकते हैं। यह पौधे मिट्टी में नहीं उगेंगे बल्कि, इन्हें नारियल के जूट में ही पैदा किया जाएगा। इससे पौधों में मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारी और जीवाणु का खतरा भी कम हो जाएगा। साथ ही बिना हाथ लगाए मशीन पौधों को रोप देगी।
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बीज की नहीं होगी बर्बादी
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि ऑटोमेटिक सीडर मशीन का एक लाभ यह भी है कि इसमें बीज की बर्बादी बिल्कुल भी नहीं होती। मशीन में लगी ट्रे में बने ब्लॉक अपने आप एक बीज लेकर उसे कोकोपीट में प्लांट कर देंगे। इसके बाद मशीन कोकोपीट में जरूरत के अनुसार नमी पैदा कर उसे बाहर निकाल देगी। इन कोकोपीट को फिर नर्सरी में सुरक्षित करना होगा। हरियाणा से मंगवाई गई यूरोपियन सीडर मशीन पूरी तरह ऑटोमेटिक है। इससे जुड़े हुए कम्प्यूटर पर एक बार कमांड देने के बाद सभी काम खुद ही कर लेती है।
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ऑटोमेटिक सीडर मशीन से कोकोपीट पर पौधों की प्लांटिंग कर रहे हैं। यहां मिट्टी का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इस तकनीक से मिट्टी में मौजूद जीवाणुओं से पौधों को बचाने में मदद मिलेगी।
-डॉ. गौरव शर्मा, एचओडी, उद्यानिकी विभाग, कृषि विश्वविद्यालय।
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