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विलुप्त हो रहा सुआटा और मामुलिया

Mon, 07 Oct 2019 01:42 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 07 Oct 2019 01:42 AM IST
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extinct suata and mamulia in bundelkhand
extinct suata and mamulia in bundelkhand
विलुप्त हो रहा सुआटा और मामुलिया
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झांसी। आश्विन मास (क्वार) की शारदीय नवरात्र में बुंदेलखंड में सुआटा, मामुलिया, झिंझिया, टेसू खेलने की परंपरा है। लेकिन अब इनकी चमक फीकी पड़ती जा रही है। इसी तरह सुबह होते ही बालिकायें बुंदेली लोक गीत गाकर गोबर से लिपे चौक पर रंगोलियां बनाती थीं लेकिन अब गीत और रंगोलियां कुछेक जगहों पर मात्र एक रस्म अदायगी बन कर रह गईं हैं।
नवरात्र में सुबह चार बजे से गूंजने वाले सूरज मल्ल के घुल्ला छूटे, चंद्रामल्ल के घुल्ला छूटे ना रे सुआटा जैसे परंपरागत बुंदेली बोल अब सुनने को नहीं मिल रहे हैं। बुंदेली लोक संस्कृति के जानकार पन्नालाल असर के अनुसार अश्विन नवरात्र के ठीक एक दिन पहले दीवार पर राक्षस का चित्र अथवा उसकी प्रतिमा बनायी जाती है। रात में ही बालिकाएं गोबर से चौक बनाती हैं। सुबह वह इन पर आकर्षक रंगोलियां बनाती हैं, जो नवमी तक प्रतिदिन बनती हैं। नवमी क ो पूजा होती है। पूजा की चुनरी सुआटा खेलने वाली लड़की, जिसका ब्याह हो जाता है, को दी जाती है। मान्यता है कि इस चुनरी के आशीर्वाद से जीवन में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं आतीं हैं। साथ ही एक मान्यता यह भी है कि सुआटा का राक्षस नरकासुर है, जिसका भगवान श्री कृष्ण ने वध किया था। वहीं, सुआटा के बुंदेली गीतों में गढ़ कुंडार के वीरों के शौर्य का वर्णन किया जाता है।
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वहीं, सुआटा के साथ ही मामुलिया और टेसू भी खेला जाता है। नवरात्र की पंचमी पर बालिकायें बेर अथवा करोंदी की कांटेदार शाखा लेकर उसे फूलों से सजाती हैं। लहंगा और चुनरी ओढ़ाती हैं। उसकी पूजा कर प्रसाद अर्पण करती हैं। इसके बाद मामुलिया को तालाब में विसर्जित किया जाता है। वहीं बालक टेसू खेलते हैं।
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