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थर्मल स्क्रीनिंग से पास होने के लिए पैरासिटामोल खाकर जा रहे हजारों यात्री
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रेलवे स्टेशन परिसर में पड़ी बुखार उतारने वाली दवा पैरासिटामॉल टैबलेट। अमर उजाला
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झांसी। रेलवे स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिंग में पास होने के लिए हजारों यात्री पैरासिटामोल दवा को खाकर यात्रा कर रहे हैं। बुखार में काम आने वाली इस दवा का असर छह से आठ घंटे तक बना रहता है, इतने वक्त में यात्री ट्रेन में सवार होकर गंतव्य के लिए रवाना हो जाते हैं। जांच के दौरान पकड़े जाने का भी डर नहीं रहता है। मगर बुखार से पीड़ित ऐसे लोग दूसरे मुसाफिरों के लिए समस्या बन सकते हैं।
कोरोना संक्रमण के चलते ट्रेनों में सर्दी, जुकाम व बुखार से पीड़ित यात्रियों को सफर करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जांच के यात्रियों को डेढ़ घंटे पहले स्टेशन पर बुलाया जा रहा है। ट्रेनों में उन्हीं यात्रियों को सवार होने दिया जा रहा है, जिनका तापमान 98.6 डिग्री तक आ रहा है। इससे ऊपर तापमान आने पर माना जाता है कि यात्री को बुखार है और यात्रा करने की स्थिति में नहीं है। इस जांच के लिए मुख्य द्वार के हॉल में थर्मल स्क्रीनिंग कंप्यूटर लगाया गया है। कंप्यूटर के सामने खड़े होते ही तापमान उसकी स्क्रीन पर लिखकर आ जाता है। मगर हजारों यात्री जिनको बुखार है। वे जांच से बचने के लिए पैरासिटामोल दवा (बुखार की दवा) खाकर स्टेशन पहुंच रहे हैं। इस दवा का असर छह से आठ घंटे तक रहता है। इस अवधि में शरीर का तापमान 98.6 डिग्री से कम बना रहता है। इतने वक्त में यात्री ट्रेन में सवार होकर गंतव्य के लिए रवाना हो जाते हैं।
कोरोना वायरस के चलते रेलवे ने 23 मार्च से ट्रेनों का संचालन पूरी तरह बंद कर रखा है। लॉकडाउन के तीसरे चरण में रेलवे ने एक मई से अलग- अलग राज्यों की सहमति पर श्रमिक एक्सप्रेस गाड़ियों का संचालन शुरू किया। इसके बाद 12 मई से अप और डाउन की तीस स्पेशल राजधानी ट्रेनों का संचालन शुरू किया गया। एक जून से 200 मेल व एक्सप्रेस स्पेशल ट्रेनें (अप और डाउन की 100 गाड़ियां) चलना शुरू हो गईं हैं। प्रत्येक ट्रेन में 1000 से 1200 यात्री सफर कर रहे हैं।
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- पैरासिटामोल दवा का असर छह से आठ घंटे तक रहता है। कोई भी कोरोना संदिग्ध यात्रा के दौरान क्वारंटीन होने से बचाने के लिए यह दवा खाकर नहीं निकले। कोरोना की जानकारी छुपाना गलत है। यह खुद के साथ- साथ दूसरों की जान के लिए भी खतरनाक है। डॉ. डीएस गुप्ता, फिजिशियन जिला अस्पताल।
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कोरोना संक्रमण के चलते ट्रेनों में सर्दी, जुकाम व बुखार से पीड़ित यात्रियों को सफर करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जांच के यात्रियों को डेढ़ घंटे पहले स्टेशन पर बुलाया जा रहा है। ट्रेनों में उन्हीं यात्रियों को सवार होने दिया जा रहा है, जिनका तापमान 98.6 डिग्री तक आ रहा है। इससे ऊपर तापमान आने पर माना जाता है कि यात्री को बुखार है और यात्रा करने की स्थिति में नहीं है। इस जांच के लिए मुख्य द्वार के हॉल में थर्मल स्क्रीनिंग कंप्यूटर लगाया गया है। कंप्यूटर के सामने खड़े होते ही तापमान उसकी स्क्रीन पर लिखकर आ जाता है। मगर हजारों यात्री जिनको बुखार है। वे जांच से बचने के लिए पैरासिटामोल दवा (बुखार की दवा) खाकर स्टेशन पहुंच रहे हैं। इस दवा का असर छह से आठ घंटे तक रहता है। इस अवधि में शरीर का तापमान 98.6 डिग्री से कम बना रहता है। इतने वक्त में यात्री ट्रेन में सवार होकर गंतव्य के लिए रवाना हो जाते हैं।
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कोरोना वायरस के चलते रेलवे ने 23 मार्च से ट्रेनों का संचालन पूरी तरह बंद कर रखा है। लॉकडाउन के तीसरे चरण में रेलवे ने एक मई से अलग- अलग राज्यों की सहमति पर श्रमिक एक्सप्रेस गाड़ियों का संचालन शुरू किया। इसके बाद 12 मई से अप और डाउन की तीस स्पेशल राजधानी ट्रेनों का संचालन शुरू किया गया। एक जून से 200 मेल व एक्सप्रेस स्पेशल ट्रेनें (अप और डाउन की 100 गाड़ियां) चलना शुरू हो गईं हैं। प्रत्येक ट्रेन में 1000 से 1200 यात्री सफर कर रहे हैं।
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- पैरासिटामोल दवा का असर छह से आठ घंटे तक रहता है। कोई भी कोरोना संदिग्ध यात्रा के दौरान क्वारंटीन होने से बचाने के लिए यह दवा खाकर नहीं निकले। कोरोना की जानकारी छुपाना गलत है। यह खुद के साथ- साथ दूसरों की जान के लिए भी खतरनाक है। डॉ. डीएस गुप्ता, फिजिशियन जिला अस्पताल।