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Jhansi News: कीटनाशकों के प्रभाव से फैले प्रदूषण से कम हो रहे कौवे

Tue, 17 Sep 2024 04:58 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 17 Sep 2024 04:58 AM IST
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Crows are decreasing due to pollution caused by pesticides
संवाद न्यूज एजेंसी
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झांसी। कीटनाशकों के बढ़ते प्रभाव से हो रहे प्रदूषण का असर इंसानों के साथ ही परिंदों पर भी पड़ रहा है। सुबह घर की मुंडेर पर बैठे कौवे की कांव-कांव सुनते ही मेहमान आने का संकेत लोग समझ लेते थे और मेहमानों के आने का इंतजार करते थे। वहीं, पितृपक्ष में नदी, तालाब के अलावा तर्पण में भी कौवों का काफी महत्व माना जाता है। पितृपक्ष में पितरों को तर्पण के अलावा कौवों को अन्नदान किया जाता है। लेकिन पर्यावरण में प्रदूषण होने के कारण अब कौवे कम ही नजर आते हैं।

पितृपक्ष 18 सितंबर से शुरू हो रहा है। इसमें नदी, तालाब पर लोगों द्वारा पुरखों को तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए स्वर्ग के कपाट खुल जाते हैं और वह अपने परिजनों के आसपास भ्रमण करते हैं। इनको तर्पण और अन्नदान किया जाता है। इसमें पितृपक्ष कौवों को अन्नदान करने से पूर्वजों को अन्न की प्राप्ति होती है लेकिन अब कौवे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच रहे हैं।
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वर्जन ---
18 सितंबर से पितृ पक्ष प्रारंभ हो रहा है, जिसमें पुरखों को तर्पण और अन्न दान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में नदी, तालाबों तर्पण और कौवों को अन्न दान करने से पुरखों को अन्न की प्राप्ति होती है। लेकिन कौवे अब बहुत कम ही नजर आते हैं। इस अवस्था में दो पूडी को तीन जगह लगाकर खीर और मिठाई रखकर गाय के लिए रख देते हैं। इसके अलावा चार पूड़ी दो जगह लगाकर खीर और मिठाई रखकर कुत्ते, कौवे और कीट पतंगों के लिए रखते हैं। अगर कौवे नहीं मिलते हैं तो पीपल के पेड़ के नीचे भोजन रख सकते हैं। - महंत विष्णु दत्त स्वामी
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वर्जन--

कौवे पहले आबादी के पास ज्यादा दिखाई देते थे और पेड़ों पर घास फूस से घोंसला बनाते थे। लेकिन शहरों में पक्के घर और सामान्य ऊंचाई के पेड़ों के कमी के कारण इनके घोंसले नहीं बना पाते हैं जिससे इनके प्रजनन में कमी आ रही है। कौवे, गिद्व, चील प्रकृति के सफाईकर्मी के रुप में काम करते हैं। जो शहर के बाहर या कचरे के आस पास मिल जाते हैं और यह सड़े गले मांस को भोजन के रुप में प्रयोग कर प्रकृति की सफाई करते हैं। इनकी कमी होने के कारण पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है। - केके सिंह, मुख्य वन संरक्षक झांसी



वर्जन -
प्रदूषण का मुख्य कारण फसलों पर रासायनिक कीटनाशक पदार्थों के छिड़काव के चलते संक्रमण है। कौवे, चील, गिद्व मांस और सड़ी गली चीजों को खाते हैं। इससे संक्रमित होकर बीमारियां हो जाती। उनकी प्रजनन क्षमता कमजोर हो रही है जिससे उनकी जनसंख्या में कमी आ रही है। इसका एक कारण शहरीकरण भी है। इसमें जंगल कम हो रहे हैं। पेड़ों को काटकर पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। पेड़ों की संख्या कम होने से कौवे अपना घोंसला भी नहीं बना पाते हैं। इसमें वह प्रजनन नहीं हो पाता। इससे इनकी जनसंख्या में कमी आ रही है। - डॉ. विजय कुमार यादव, एसोसिएट प्रोफसर जंतु विभाग, बिपिन बिहारी महाविद्यालय
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