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झांसी में फलों के साथ उगाया चारा, तकनीक देशभर ने अपनाई

Fri, 29 Jan 2021 01:02 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 29 Jan 2021 01:02 AM IST
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Charagah research center in jhansi
झांसी। बगीचे में लगने वाले फलों के साथ मिले चारे को देशभर ने अपनाया है। भारतीय चारागाह और चारा अनुसंधान संस्थान की 10 साल की मेहनत और प्रयोग से कई राज्यों के करीब 100 से अधिक किसानों का मुनाफा बढ़ा है। साथ ही, संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध को केंद्र सरकार ने भी सराहा है। झांसी में तकनीकी के प्रयोग से 20-30 टन चारे का उत्पादन और फलों की पैदावार 7.15 टन तक बढ़ गई।
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दरअसल, भारतीय चारागाह और चारा अनुसंधान संस्थान झांसी के वैज्ञानिकों ने चारे का उत्पादन बढ़ाने के लिए बगीचों में प्रयोग किया था। इसके तहत अमरूद, आंवला, बेर और बेल बगीचों में धवलू घास, गिनी घास, अंजन घास, धामन घास और दलहनी चारे को लगाया गया था।
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वैज्ञानिकों ने बगीचों में पेड़ों के बीच इन घास को 80-150 सेमी मिट्टी गहराई में लगाया। करीब 10 साल के परीक्षण के बाद पाया गया कि प्रयोग के बाद 20-30 टन प्रति हेक्टेयर चारे का उत्पादन हुआ। साथ ही फलों की पैदावार भी 7.15 टन प्रति हेक्टेयर तक बढ़ गई। इसके साथ ही 0.5-0.8 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष मिट्टी का क्षरण भी कम हुआ। इस तकनीकी को केंद्र सरकार के अलावा कई राज्यों से सराहा और अपनाया। इसके अलावा कृषि में नवाचार की पहल करने वाली संस्था एनआईसीआरए, केवीके समेत तमाम कृषि विज्ञान संस्थाओं के जरिए किसानों ने अपनाकर मुनाफा कमाया है।
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अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में हुआ था प्रयोग
ग्रासलैंड के वैज्ञानिकों के मुताबिक यह प्रयोग बारिश से प्रभावित रहने वाले बुंदेलखंड के कुछ क्षेत्रों के साथ महाराष्ट्र, कर्नाटक के अधिक वर्षा वाले इलाकों में किया था। जिससे पता चला कि बारिश का चारा और फलों के उत्पादन पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा। इसके साथ ही चारे का उत्पादन अमरूद, आंवला, बेर, बेल जैसे फलों से करना कठिन था, लेकिन प्रयोग ने इस भ्र्रम को भी दूर किया।

उद्यान चारागाह पद्धति से फलों की पैदावार बढ़ी है। इस तकनीक को केंद्र सरकार के कई कार्यक्रम और कई राज्यों के किसानों ने भी अपनाया है। जिससे उनको अच्छा मुनाफा हो रहा है। कई गैर सरकारी संगठन, गोशालाओं में इस विधि से चारे के साथ फलों का उत्पादन किया जा रहा है।
डॉ. विजय कुमार यादव, निदेशक, ग्रासलैंड
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