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बालू घाट पर नहीं बन सकता बांध
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 28 Apr 2017 01:20 AM IST
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sand ghat
- फोटो : demo
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सिंचाई विभाग का नियम है कि जहां नदी बालू छोड़ने लगती है, वहां बांध नहीं बनाया जा सकता है। बेतवा नदी का एरच घाट बालू का बड़ा केंद्र है। यही पर एरच बहुउद्देशीय बांध बनाया जा रहा है, जो सिंचाई विभाग के नियमों के अनुसार गलत है।
गरौठा तहसील के ग्राम जुझारपुरा में बेतवा नदी पर बनाये जा रहे एरच बहुद्देशीय बांध परियोजना की उपयोगिता पर शुरुआत से ही सवाल उठाये जाते रहे हैं, लेकिन तमाम शंकाओं को दरकिनार करते हुये करोड़ों रुपयों की परियोजना की शुरुआत कर दी गई। दिलचस्प यह है, कि बांध परियोजना के लिए जरूरी तमाम स्वीकृतियों को लिए बिना ही बांध का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। बांध निर्माण से पहले बनाई गई कार्ययोजना में बताया गया कि एरच बांध को पारीछा बांध की डाउन स्ट्रीम में चालीस किलोमीटर दूर जुझारपुरा गांव में बनाया जाएगा। इस बांध के निर्माण से 62 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण किया जाएगा। इस पानी से 1850 हेक्टेयर में सिंचाई होने के साथ ही पेयजल और बिजली उत्पादन किया जाएगा। बहुउद्देशीय बांध परियोजना में 1.8 मेगावाट बिजली उत्पादन भी प्रस्तावित है, जिसके लिये 0.9 मेगावाट की दो यूनिट लगाईं जाएगी। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की मानें तो जिस जगह पर बांध का निर्माण किया जा रहा है, वहां पर बेतवा नदी सेंड डिपोजिट (बालू छोड़ना) करने लगती है। सिंचाई विभाग के तकनीकी नियमों के मुताबिक जहां पर नदी बालू छोड़ने लगे, वहां बांध नहीं बनाया जा सकता है।
झांसी मंडल में एरच घाट बालू का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है। ऐसी जगह पर बांध बनाना नियमों की अनदेखी करना है। इसके साथ ही बांध की उपयोगिता के पीछे तर्क दिया गया कि पारीछा बांध की डाउनस्ट्रीम से हर साल एक हजार मिलियन क्यूबिक मीटर पानी बर्बाद हो जाता है। इसे एरच बांध के निर्माण से बचाया जाएगा। हकीकत में यह एक हजार क्यूबिक मीटर पानी नदी में बहकर नहीं बल्कि सीपेज (लीकेज) से बर्बाद होना पानी है। सीपेज के पानी को बांध में एकत्र करना मुमकिन ही नहीं है। इन्हीं तकनीकी खामियों को देखते हुए नाबार्ड ने पहली बार में बांध के लिए बजट देने से मना कर दिया था।
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नहीं ली जरूरी स्वीकृतियां
एरच बहुउद्देशीय बांध परियोजना के निर्माण कार्य शुरू हो गया है, लेकिन बांध बनाने से ली जाने वाली जरूरी स्वीकृतियां नहीं ली गई। एरच बांध बेतवा नदी पर बनाया जा रहा है। बेतवा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश से होता है और इस नदी पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का बराबर हक है। ऐसे में इस नदी पर बांध बनाने से पहले इंटर स्टेट स्वीकृति लेना जरूरी है, लेकिन स्वीकृति नहीं ली गई। वहीं बांध के लिए पर्यावरण, वन मंत्रालय की स्वीकृति भी नहीं ली गई है। जब बांध निर्माण के लिए इंटर स्टेट, पर्यावरण व वन मंत्रालयों की स्वीकृतियां भी नहीं ली गई, इस वजह से इस परियोजना को अब सेंटर वाटर कमीशन की स्वीकृति भी नहीं मिल सकती। बिना जरूरी स्वीकृतियों के करोड़ों रुपयों का बजट जारी होना घोर अनियमितता की श्रेणी में आता है।
किया गया गुमराह
एरच बांध के लिये जरूरी स्वीकृति न लेने के पीछे विभागीय अधिकारियों ने परियोजना के माइनर प्रोजेक्ट श्रेणी में आने का हवाला दिया गया। सिंचाई विभाग के नियमों के मुताबिक दो हजार हेक्टेयर से कम क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध कराने वाले बांध को माइनर प्रोजेक्ट की श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन बहुउद्देशीय परियोजना है, तो माइनर प्रोजेक्ट की श्रेणी में आने के बावजूद भी सारी स्वीकृतियां ली जाती है। जांच दल ने इस खामी को पकड़ लिया है।
किसानों से ज्यादा ठेकेदारों का ख्याल
जानकारों का मानना है कि एरच बांध परियोजना किसानों के लिए ठेकेदारों का हित साधने के लिए तैयार की गई है। अधिकारियों ने बांध निर्माण के साथ यहां पर दस हेक्टेयर में एक आदर्श फार्म स्थापित करने की योजना बनाई है, जिसमें इजरायल की तकनीक के आधार पर सब्जियों व फलों की खेती की जाएगी। साथ ही बांध को विशेष पर्यटक स्थल पर विकसित करने के लिए करोड़ों रुपये आवंटित किए गए हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि बांध की तलहटी में निजी संस्था विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी में थी, लेकिन अब जांच शुरू होने होने के बाद इस सब गतिविधियों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
टालते रहे हर सवाल
एरच बांध परियोजना में मुख्य भूमिका निभाने वाले तत्कालीन अधिशासी अभियंता विनय श्रीवास्तव इससे संबंधित पूछे गए हर सवाल को टालते रहे। उन्होंने कहा कि हम इंजीनियर हैं, जानते हैं कहां क्या बनाना है क्या नहीं बनाना है। प्रोजेक्ट को माइनर बताकर उन्होंने स्वीकृतियों को गैर जरूरी बताया। अन्य सवालों को भी वह टालते ही रहे।
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गरौठा तहसील के ग्राम जुझारपुरा में बेतवा नदी पर बनाये जा रहे एरच बहुद्देशीय बांध परियोजना की उपयोगिता पर शुरुआत से ही सवाल उठाये जाते रहे हैं, लेकिन तमाम शंकाओं को दरकिनार करते हुये करोड़ों रुपयों की परियोजना की शुरुआत कर दी गई। दिलचस्प यह है, कि बांध परियोजना के लिए जरूरी तमाम स्वीकृतियों को लिए बिना ही बांध का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। बांध निर्माण से पहले बनाई गई कार्ययोजना में बताया गया कि एरच बांध को पारीछा बांध की डाउन स्ट्रीम में चालीस किलोमीटर दूर जुझारपुरा गांव में बनाया जाएगा। इस बांध के निर्माण से 62 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण किया जाएगा। इस पानी से 1850 हेक्टेयर में सिंचाई होने के साथ ही पेयजल और बिजली उत्पादन किया जाएगा। बहुउद्देशीय बांध परियोजना में 1.8 मेगावाट बिजली उत्पादन भी प्रस्तावित है, जिसके लिये 0.9 मेगावाट की दो यूनिट लगाईं जाएगी। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की मानें तो जिस जगह पर बांध का निर्माण किया जा रहा है, वहां पर बेतवा नदी सेंड डिपोजिट (बालू छोड़ना) करने लगती है। सिंचाई विभाग के तकनीकी नियमों के मुताबिक जहां पर नदी बालू छोड़ने लगे, वहां बांध नहीं बनाया जा सकता है।
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झांसी मंडल में एरच घाट बालू का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है। ऐसी जगह पर बांध बनाना नियमों की अनदेखी करना है। इसके साथ ही बांध की उपयोगिता के पीछे तर्क दिया गया कि पारीछा बांध की डाउनस्ट्रीम से हर साल एक हजार मिलियन क्यूबिक मीटर पानी बर्बाद हो जाता है। इसे एरच बांध के निर्माण से बचाया जाएगा। हकीकत में यह एक हजार क्यूबिक मीटर पानी नदी में बहकर नहीं बल्कि सीपेज (लीकेज) से बर्बाद होना पानी है। सीपेज के पानी को बांध में एकत्र करना मुमकिन ही नहीं है। इन्हीं तकनीकी खामियों को देखते हुए नाबार्ड ने पहली बार में बांध के लिए बजट देने से मना कर दिया था।
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नहीं ली जरूरी स्वीकृतियां
एरच बहुउद्देशीय बांध परियोजना के निर्माण कार्य शुरू हो गया है, लेकिन बांध बनाने से ली जाने वाली जरूरी स्वीकृतियां नहीं ली गई। एरच बांध बेतवा नदी पर बनाया जा रहा है। बेतवा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश से होता है और इस नदी पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का बराबर हक है। ऐसे में इस नदी पर बांध बनाने से पहले इंटर स्टेट स्वीकृति लेना जरूरी है, लेकिन स्वीकृति नहीं ली गई। वहीं बांध के लिए पर्यावरण, वन मंत्रालय की स्वीकृति भी नहीं ली गई है। जब बांध निर्माण के लिए इंटर स्टेट, पर्यावरण व वन मंत्रालयों की स्वीकृतियां भी नहीं ली गई, इस वजह से इस परियोजना को अब सेंटर वाटर कमीशन की स्वीकृति भी नहीं मिल सकती। बिना जरूरी स्वीकृतियों के करोड़ों रुपयों का बजट जारी होना घोर अनियमितता की श्रेणी में आता है।
किया गया गुमराह
एरच बांध के लिये जरूरी स्वीकृति न लेने के पीछे विभागीय अधिकारियों ने परियोजना के माइनर प्रोजेक्ट श्रेणी में आने का हवाला दिया गया। सिंचाई विभाग के नियमों के मुताबिक दो हजार हेक्टेयर से कम क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध कराने वाले बांध को माइनर प्रोजेक्ट की श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन बहुउद्देशीय परियोजना है, तो माइनर प्रोजेक्ट की श्रेणी में आने के बावजूद भी सारी स्वीकृतियां ली जाती है। जांच दल ने इस खामी को पकड़ लिया है।
किसानों से ज्यादा ठेकेदारों का ख्याल
जानकारों का मानना है कि एरच बांध परियोजना किसानों के लिए ठेकेदारों का हित साधने के लिए तैयार की गई है। अधिकारियों ने बांध निर्माण के साथ यहां पर दस हेक्टेयर में एक आदर्श फार्म स्थापित करने की योजना बनाई है, जिसमें इजरायल की तकनीक के आधार पर सब्जियों व फलों की खेती की जाएगी। साथ ही बांध को विशेष पर्यटक स्थल पर विकसित करने के लिए करोड़ों रुपये आवंटित किए गए हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि बांध की तलहटी में निजी संस्था विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी में थी, लेकिन अब जांच शुरू होने होने के बाद इस सब गतिविधियों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
टालते रहे हर सवाल
एरच बांध परियोजना में मुख्य भूमिका निभाने वाले तत्कालीन अधिशासी अभियंता विनय श्रीवास्तव इससे संबंधित पूछे गए हर सवाल को टालते रहे। उन्होंने कहा कि हम इंजीनियर हैं, जानते हैं कहां क्या बनाना है क्या नहीं बनाना है। प्रोजेक्ट को माइनर बताकर उन्होंने स्वीकृतियों को गैर जरूरी बताया। अन्य सवालों को भी वह टालते ही रहे।