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भाजपा अपने संगठन को रेलवे में दिलाना चाहती है मान्यता!
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झांसी। भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ अपने से संबद्ध यूनियनों को प्रत्येक रेलवे जोन में लाना चाहता है। यही कारण है कि सदस्यता का बहुमत जुटाने के लिए भारतीय मजदूर संघ के नेता लगातार संपर्क कर रहे हैं। सात फरवरी को झांसी में प्रदेश प्रभारी अनुपम व श्रीकांत अवस्थी समीक्षा करेंगे।
रेलवे अपने कर्मचारी संगठनों को मान्यता देने के लिए हर छह साल में चुनाव कराता है। पिछली बार 2013 में 25, 26 और 27 अप्रैल को चुनाव हुए थे। इस हिसाब से मान्यता प्राप्त संगठनों का कार्यकाल पूरा हो गया है। लेकिन, अब तक चुनाव नहीं हुए। पहले लोकसभा चुनाव और फिर कोरोना महामारी के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। अब केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव कर दिया है। इसमें अभी तक मजदूरों और कर्मचारियों की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए 44 कानून थे, लेकिन अब इनका चार कोड में परिवर्तन कर दिया गया है। औद्योगिक संबंधित कोड 120 के अंतर्गत उसी संगठन को मान्यता मिल सकती है, जिसके पास 51 फीसदी सदस्यता है। ज्यादातर विभागों में एक ही यूनियन काम कर रही है। लेकिन, रेलवे में ऐसा नहीं है। यहां वर्तमान में दो यूनियनों को मान्यता है। रेलवे के कई और संगठनों को भी चुनाव लड़ने का अधिकार है।
ऐसे में नए श्रम कानून को लागू किया जाएगा या मतदान के जरिए चुनाव होगा, अभी इस स्थिति को साफ नहीं किया गया है। भाजपा से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ रेलवे से जुड़े अपने संगठन को मान्यता दिलाना चाहता है। इसके लिए वह कोशिश कर रहा है कि सभी सरकारी व गैर संगठित क्षेत्रों के कर्मचारियों को जोड़ा जाए। इस हिसाब से भारतीय मजदूर संघ के पूरे देश में दो करोड़ सदस्य हैं। इसी आंकड़े के आधार पर वह मान्यता लेना चाहता है। इस नीति को लागू कराने के लिए भारतीय मजदूर संघ के नेताओं के लगातार दौरे जारी हैं।
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2007 से शुरू हुई थी चुनाव की परंपरा
रेलवे में शुरूआत से ही नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे व ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन से जुड़ी यूनियन को मान्यता मिलती आ रही है। इस नीति के खिलाफ भारतीय मजदूर संघ ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उस समय रेल मंत्री नीतीश कुमार थे। मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे से पूछा था कि अभी किस तरह मान्यता दी जाती है तो बताया गया कि सदस्यता के आधार पर। यूनियनों से सदस्यता पूछी गई तो किसी ने 12 लाख तो किसी ने 16 लाख बताई। छोटे संगठनों ने भी अपनी सदस्यता के बारे में बताया। उस समय रेलवे में 16 लाख कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन सदस्यता 32 लाख से ज्यादा हो रही थी। एक कर्मचारी दो- दो जगह सदस्य था। मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय से संतुष्ट नहीं होने पर भारतीय मजदूर संघ ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद 2005 में चुनाव के जरिए मान्यता देने का निर्णय सुनाया। रेलवे ने चुनाव की तैयारी शुरू की। इसके बाद 2007 में पहली बार यूनियन मान्यता के लिए चुनाव कराए गए।
यह मिलती हैं सुविधाएं
रेलवे की तरफ से मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन के पदाधिकारियों को कार्ड पास जारी किए जाते हैं। इनकी मदद से पदाधिकारी मंडल के किसी भी स्टेशन के लिए मुफ्त यात्रा कर सकते हैं। हर तीन महीने में प्रबंध तंत्र की बैठक में कर्मचारियों की समस्याओं को रखने का मौका मिलता है। धरना- प्रदर्शन कर मांग पत्र सौंप सकते हैं। किसी भी अधिकारी से सीधी मुलाकात कर सकते हैं। संगठन की मासिक बैठक के लिए स्पेशल अवकाश मिलता है।
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रेलवे अपने कर्मचारी संगठनों को मान्यता देने के लिए हर छह साल में चुनाव कराता है। पिछली बार 2013 में 25, 26 और 27 अप्रैल को चुनाव हुए थे। इस हिसाब से मान्यता प्राप्त संगठनों का कार्यकाल पूरा हो गया है। लेकिन, अब तक चुनाव नहीं हुए। पहले लोकसभा चुनाव और फिर कोरोना महामारी के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। अब केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव कर दिया है। इसमें अभी तक मजदूरों और कर्मचारियों की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए 44 कानून थे, लेकिन अब इनका चार कोड में परिवर्तन कर दिया गया है। औद्योगिक संबंधित कोड 120 के अंतर्गत उसी संगठन को मान्यता मिल सकती है, जिसके पास 51 फीसदी सदस्यता है। ज्यादातर विभागों में एक ही यूनियन काम कर रही है। लेकिन, रेलवे में ऐसा नहीं है। यहां वर्तमान में दो यूनियनों को मान्यता है। रेलवे के कई और संगठनों को भी चुनाव लड़ने का अधिकार है।
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ऐसे में नए श्रम कानून को लागू किया जाएगा या मतदान के जरिए चुनाव होगा, अभी इस स्थिति को साफ नहीं किया गया है। भाजपा से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ रेलवे से जुड़े अपने संगठन को मान्यता दिलाना चाहता है। इसके लिए वह कोशिश कर रहा है कि सभी सरकारी व गैर संगठित क्षेत्रों के कर्मचारियों को जोड़ा जाए। इस हिसाब से भारतीय मजदूर संघ के पूरे देश में दो करोड़ सदस्य हैं। इसी आंकड़े के आधार पर वह मान्यता लेना चाहता है। इस नीति को लागू कराने के लिए भारतीय मजदूर संघ के नेताओं के लगातार दौरे जारी हैं।
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2007 से शुरू हुई थी चुनाव की परंपरा
रेलवे में शुरूआत से ही नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे व ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन से जुड़ी यूनियन को मान्यता मिलती आ रही है। इस नीति के खिलाफ भारतीय मजदूर संघ ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उस समय रेल मंत्री नीतीश कुमार थे। मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे से पूछा था कि अभी किस तरह मान्यता दी जाती है तो बताया गया कि सदस्यता के आधार पर। यूनियनों से सदस्यता पूछी गई तो किसी ने 12 लाख तो किसी ने 16 लाख बताई। छोटे संगठनों ने भी अपनी सदस्यता के बारे में बताया। उस समय रेलवे में 16 लाख कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन सदस्यता 32 लाख से ज्यादा हो रही थी। एक कर्मचारी दो- दो जगह सदस्य था। मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय से संतुष्ट नहीं होने पर भारतीय मजदूर संघ ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद 2005 में चुनाव के जरिए मान्यता देने का निर्णय सुनाया। रेलवे ने चुनाव की तैयारी शुरू की। इसके बाद 2007 में पहली बार यूनियन मान्यता के लिए चुनाव कराए गए।
यह मिलती हैं सुविधाएं
रेलवे की तरफ से मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन के पदाधिकारियों को कार्ड पास जारी किए जाते हैं। इनकी मदद से पदाधिकारी मंडल के किसी भी स्टेशन के लिए मुफ्त यात्रा कर सकते हैं। हर तीन महीने में प्रबंध तंत्र की बैठक में कर्मचारियों की समस्याओं को रखने का मौका मिलता है। धरना- प्रदर्शन कर मांग पत्र सौंप सकते हैं। किसी भी अधिकारी से सीधी मुलाकात कर सकते हैं। संगठन की मासिक बैठक के लिए स्पेशल अवकाश मिलता है।