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ग्रामीणों की रायशुमारी से पानी बचाने के लिए बनेगा प्लान
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झांसी। अटल भूजल योजना के अंतर्गत मऊरानीपुर और बबीना ब्लॉक के गांवों में सामुदायिक भागीदारी से वाटर सिक्योरिटी प्लान तैयार किया जाएगा। इसमें ग्रामीणों से बात कर गांव में जरूरत के हिसाब से भूजल स्तर कैसे बढ़े, इसको लेकर कार्ययोजना बनाई जाएगी और फिर उसी के अनुरूप काम होगा। प्लान तैयार होने के बाद उसे जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित कमेटी के सामने पेश किया जाएगा। स्वीकृति के बाद योजना पर काम शुरू होगा।
नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के अनुसार नवीनतम भूजल संसाधन आंकलन के आधार पर जिले के ब्लॉक मऊरानीपुर और बबीना पानी की सेमी क्रिटिकल श्रेणी में आते हैं। यानी यहां पर भूजल का साठ प्रतिशत से अधिक दोहन हो रहा है, जबकि पानी का रीचार्ज बहुत कम हो रहा है। योजना केंद्र सरकार की है। जालौन जिले को छोड़कर बुंदेलखंड के अन्य सभी जिले इसके अलावा बागपत, मेरठ और शामली जिले भी शामिल किए गए हैं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया है। इसके बाद काम का स्वरूप तैयार किया गया और 25, 26 व 27 मार्च को योजना के अंतर्गत काम कर रहे कर्मचारियों को लखनऊ में प्रशिक्षण दिया गया।
योजना का उद्देश्य जन सहभागिता के जरिये भूजल प्रबंधन में दीर्घकालिक सुधार करना है। इसके लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर दी गई है। योजना से जुड़े स्वयंसेवी संगठन गांवों में जाकर चौपाल लगाकर लोगों से बातचीत करेंगे। उनसे पूछेंगे कि गांव में पानी की क्या- क्या जरूरत है। गांव में पुराना तालाब था या नहीं। यदि था तो उससे गांव के लोगों के पानी की जरूरत कैसे पूरी होती थी। यदि तालाब को पुनर्जीवन दे दिया जाए तो किस हद तक पानी की जरूरत पूरी होगी और भूजल स्तर कितना बढ़ेगा।
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प्लान तैयार होने के बाद उसे जिलाधिकारी की कमेटी को सौंपा जाएगा। इसके बाद देखा जाएगा कि चेकडैम बनाने की जरूरत है तो लघु सिंचाई विभाग को काम की जिम्मेदारी दी जाएगी। यदि सिंचाई की आवश्यकताओं से काम चल जाएगा तो उद्यान विभाग को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी कि स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति पर जोर दिया जाए। यदि किसी खास फसल की पैदावार करने से उस गांव में पानी की अधिक खपत हो रही है तो कृषि विभाग को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी कि ऐसी फसल के बारे में सुझाव दें ताकि कम पानी में फसल उत्पादन हो सके।
यह है अटल भूजल योजना
बढ़ते जल संकट और लगातार घटते जा रहे भूजल स्तर में सुधार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई अटल भूजल योजना के तहत कम पानी में अधिक पैदावार वाली फसलों की बुवाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, पुराने तालाब और पोखरों को पुनर्जीवित करने के साथ- साथ पानी की एक- एक बूंद संजोने के स्रोत तलाशे जाएंगे। योजना के अंतर्गत जल संरक्षण और जल संचयन का काम होगा। योजना 2026 तक चलेगी।
क्या कहते हैं नमामि गंगे के आंकड़े
नमामि गंगे तथा ग्रामीण जलापूर्ति विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पेयजल के लिए 80 प्रतिशत और औद्योगिक क्षेत्र के लिए 85 प्रतिशत निर्भरता भूजल स्तर पर है। इसी तरह 70 प्रतिशत सिंचाई भूजल पर निर्भर है।
सामुदायिक भागीदारी (जन सहभागिता) से गांवों में भूजल स्तर सुधारने का प्लान तैयार होगा। इसके बाद उसे जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित कमेटी के समक्ष रखा जाएगा। स्वीकृति मिलने के बाद योजना को अमली जामा पहनाया जाएगा। - शशांक शेखर सिंह, सहायक अभियंता, भूगर्भ विभाग
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नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के अनुसार नवीनतम भूजल संसाधन आंकलन के आधार पर जिले के ब्लॉक मऊरानीपुर और बबीना पानी की सेमी क्रिटिकल श्रेणी में आते हैं। यानी यहां पर भूजल का साठ प्रतिशत से अधिक दोहन हो रहा है, जबकि पानी का रीचार्ज बहुत कम हो रहा है। योजना केंद्र सरकार की है। जालौन जिले को छोड़कर बुंदेलखंड के अन्य सभी जिले इसके अलावा बागपत, मेरठ और शामली जिले भी शामिल किए गए हैं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया है। इसके बाद काम का स्वरूप तैयार किया गया और 25, 26 व 27 मार्च को योजना के अंतर्गत काम कर रहे कर्मचारियों को लखनऊ में प्रशिक्षण दिया गया।
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योजना का उद्देश्य जन सहभागिता के जरिये भूजल प्रबंधन में दीर्घकालिक सुधार करना है। इसके लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर दी गई है। योजना से जुड़े स्वयंसेवी संगठन गांवों में जाकर चौपाल लगाकर लोगों से बातचीत करेंगे। उनसे पूछेंगे कि गांव में पानी की क्या- क्या जरूरत है। गांव में पुराना तालाब था या नहीं। यदि था तो उससे गांव के लोगों के पानी की जरूरत कैसे पूरी होती थी। यदि तालाब को पुनर्जीवन दे दिया जाए तो किस हद तक पानी की जरूरत पूरी होगी और भूजल स्तर कितना बढ़ेगा।
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प्लान तैयार होने के बाद उसे जिलाधिकारी की कमेटी को सौंपा जाएगा। इसके बाद देखा जाएगा कि चेकडैम बनाने की जरूरत है तो लघु सिंचाई विभाग को काम की जिम्मेदारी दी जाएगी। यदि सिंचाई की आवश्यकताओं से काम चल जाएगा तो उद्यान विभाग को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी कि स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति पर जोर दिया जाए। यदि किसी खास फसल की पैदावार करने से उस गांव में पानी की अधिक खपत हो रही है तो कृषि विभाग को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी कि ऐसी फसल के बारे में सुझाव दें ताकि कम पानी में फसल उत्पादन हो सके।
यह है अटल भूजल योजना
बढ़ते जल संकट और लगातार घटते जा रहे भूजल स्तर में सुधार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई अटल भूजल योजना के तहत कम पानी में अधिक पैदावार वाली फसलों की बुवाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, पुराने तालाब और पोखरों को पुनर्जीवित करने के साथ- साथ पानी की एक- एक बूंद संजोने के स्रोत तलाशे जाएंगे। योजना के अंतर्गत जल संरक्षण और जल संचयन का काम होगा। योजना 2026 तक चलेगी।
क्या कहते हैं नमामि गंगे के आंकड़े
नमामि गंगे तथा ग्रामीण जलापूर्ति विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पेयजल के लिए 80 प्रतिशत और औद्योगिक क्षेत्र के लिए 85 प्रतिशत निर्भरता भूजल स्तर पर है। इसी तरह 70 प्रतिशत सिंचाई भूजल पर निर्भर है।
सामुदायिक भागीदारी (जन सहभागिता) से गांवों में भूजल स्तर सुधारने का प्लान तैयार होगा। इसके बाद उसे जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित कमेटी के समक्ष रखा जाएगा। स्वीकृति मिलने के बाद योजना को अमली जामा पहनाया जाएगा। - शशांक शेखर सिंह, सहायक अभियंता, भूगर्भ विभाग