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गोलियां खत्म होने के बाद खंजर से जारी रखी लड़ाई और जीते
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झांसी। सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने जीत हासिल की थी। इस दिन को विजय दिवस के रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है। 13 दिन चले इस युद्ध में भारतीय सेना के कई जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई थी, जिनमें से कई जवान शहीद भी हो गए। योद्धाओं का कहना है कि गोलियां खत्म होने के बाद खंजर से लड़ाई जारी रखी और जीते।
जोश और साहस के साथ भारतीय शूरवीरों ने डटकर पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया 50 साल बाद आज भी उस युद्ध में शामिल योद्धा युद्ध के दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं। करगुवां जी स्थित डिफेंस कॉलोनी में 1971 युद्ध के कुछ योद्धा हैं, जो अपने साहस के साथ देश की रक्षा के लिए युद्ध क्षेत्र में उतरे। उन्होंने जान की परवाह किए बिना आगे बढ़कर गोलीबारी का सामना करते हुए दुश्मन को धूल चटाई।
फायरिंग की आवाज से सुन्न पड़ गए थे कान
जब 1971 में युद्ध के लिए बुुलाया गया था तो मैं मद्रास रेजीमेंट हैदराबाद में लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात था। 48 घंटे की लगातार गोलीबारी के बाद गोलियां भी समाप्त हो गई थीं। तब खंजर से लड़ाई जारी रखी थी। उन्होंने बताया कि फायरिंग और तोपों की आवाज से कान सुन्न पड़ गए। कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन फिर अपनी प्लाटून के साथ डटे रहे। डेढ़ किलोमीटर लंबे माइन फील्ड में सेफ लेन बनाकर ग्रेनेडियर को सुरक्षित जरवाल गांव तक पहुंचाया। हमारी रेजीमेंट के 151 जवान और 7 अफसर इस युद्ध में शहीद हो गए थे। उनको याद कर आंखें आज भी नम हो जाती हैं। - जेपी सिंह, रिटायर्ड मेजर
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कोट के बिना ही पाकिस्तान को चटाई धूल
फील्ड रेजीमेंट आर्टिलरी में तैनात था। फेनी नदी पार पाकिस्तान के कई हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। हमारी प्लाटून के सिर्फ एक कैप्टन अली शहीद हुए थे, बाकी सब सुरक्षित दुश्मन को धूल चटाकर वापस आए थे। फेनी नदी टैंकों की मदद से पार कर पाकिस्तान जो कि अब बांग्लादेश है, उसमें प्रवेश किया था। कोट के बिना ही फ्रंट पर लड़े थे और दुश्मन के घर में घुसे थे। बाद में झांसी डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ द्वारा व्यक्तिगत सम्मान प्रदान किया गया। - वीबी दीक्षित, रिटायर्ड आर्टिलरी लेफ्टिनेंट
शूरवीरों का किया गया स्मरण
झांसी। राष्ट्र गौरव स्मृति संस्थान के कार्यालय में विजय दिवस की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अमीर चंद आर्य ने भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों को नमन किया। जिन्होंने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। मनीराम कुशवाहा ने सशक्त नेतृत्व प्रदान करने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और रक्षामंत्री जगजीवन को याद किया। जिनके शासन काल में भारतीय शूरवीरों ने 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। इस अवसर पर मनोज तिवारी, ओमप्रकाश बुंदेला, बलराम साहनी, नंदकिशोर राव, ऋषभ साहू आदि मौजूद रहे।
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जोश और साहस के साथ भारतीय शूरवीरों ने डटकर पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया 50 साल बाद आज भी उस युद्ध में शामिल योद्धा युद्ध के दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं। करगुवां जी स्थित डिफेंस कॉलोनी में 1971 युद्ध के कुछ योद्धा हैं, जो अपने साहस के साथ देश की रक्षा के लिए युद्ध क्षेत्र में उतरे। उन्होंने जान की परवाह किए बिना आगे बढ़कर गोलीबारी का सामना करते हुए दुश्मन को धूल चटाई।
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फायरिंग की आवाज से सुन्न पड़ गए थे कान
जब 1971 में युद्ध के लिए बुुलाया गया था तो मैं मद्रास रेजीमेंट हैदराबाद में लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात था। 48 घंटे की लगातार गोलीबारी के बाद गोलियां भी समाप्त हो गई थीं। तब खंजर से लड़ाई जारी रखी थी। उन्होंने बताया कि फायरिंग और तोपों की आवाज से कान सुन्न पड़ गए। कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन फिर अपनी प्लाटून के साथ डटे रहे। डेढ़ किलोमीटर लंबे माइन फील्ड में सेफ लेन बनाकर ग्रेनेडियर को सुरक्षित जरवाल गांव तक पहुंचाया। हमारी रेजीमेंट के 151 जवान और 7 अफसर इस युद्ध में शहीद हो गए थे। उनको याद कर आंखें आज भी नम हो जाती हैं। - जेपी सिंह, रिटायर्ड मेजर
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कोट के बिना ही पाकिस्तान को चटाई धूल
फील्ड रेजीमेंट आर्टिलरी में तैनात था। फेनी नदी पार पाकिस्तान के कई हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। हमारी प्लाटून के सिर्फ एक कैप्टन अली शहीद हुए थे, बाकी सब सुरक्षित दुश्मन को धूल चटाकर वापस आए थे। फेनी नदी टैंकों की मदद से पार कर पाकिस्तान जो कि अब बांग्लादेश है, उसमें प्रवेश किया था। कोट के बिना ही फ्रंट पर लड़े थे और दुश्मन के घर में घुसे थे। बाद में झांसी डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ द्वारा व्यक्तिगत सम्मान प्रदान किया गया। - वीबी दीक्षित, रिटायर्ड आर्टिलरी लेफ्टिनेंट
शूरवीरों का किया गया स्मरण
झांसी। राष्ट्र गौरव स्मृति संस्थान के कार्यालय में विजय दिवस की 50वीं वर्षगांठ मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अमीर चंद आर्य ने भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों को नमन किया। जिन्होंने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। मनीराम कुशवाहा ने सशक्त नेतृत्व प्रदान करने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और रक्षामंत्री जगजीवन को याद किया। जिनके शासन काल में भारतीय शूरवीरों ने 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। इस अवसर पर मनोज तिवारी, ओमप्रकाश बुंदेला, बलराम साहनी, नंदकिशोर राव, ऋषभ साहू आदि मौजूद रहे।