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खाती बाबा मंदिर-City
Updated Wed, 26 Jul 2017 09:42 PM IST
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श्रावण मेले में बुंदेली संस्कृति की झलक
सब हेड: ईसाई टोला के खातीबाबा मंदिर में 1950 से लग रहा है मेला
क्रासर
गोटों और ढांक की गूंजती है धुन, नागों की होती है पूजा
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
अगर आप बुंदेली संस्कृति और लोक कलाओं से रूबरू होना चाहते हैं तो ईसाई टोला में खाती बाबा के मंदिर पर लगने वाले श्रावण मेले में जरूर जाइये। 1950 से लगातार आयोजित इस मेले में आपको गोटों और ढांक की धुन सुनाई देंगी। यहां नागों की पूजा होती है। बुधवार को मेले का विधिवत शुभारंभ हुआ।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की नगरी में कभी नागपंचमी पर लगभग पांच मेला लगते थे, जिनमें गोपाल की बगिया, शंकर सिंह का बगीचा का मेला प्रमुख हैं। दूर-दूर से सपेरे आते थे, नागों की कई प्रजातियों के साथ। लेकिन यह मेले अब नहीं लगते हैं। ईसाईटोला के खाती बाबा मंदिर में नाग पंचमी का मेला आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है। मेला कार्यक्रम संचालक सियाराम शरण चतुर्वेदी और संयोजक भोले कुशवाहा ने बताया कि कभी खातीबाबा क्षेत्र पूरा जंगल था। खातीबाबा के दर्शन और नागपंचमी पर देवता क ी पूजा के लिए जगह-जगह से श्रद्धालु आते थे, जो आज भी जारी हैं। फर्क सिर्फ इतना हैं कि पहले सीमित दुकानें होती थी, आज लगभग 60 से ज्यादा दुकानें लगी हैं। नागपंचमी के दिन मंदिर के पीछे बनी बांबी की श्रद्धालु पूजा करते है। 1950 में बैजनाथ कुशवाहा ने मेले की परंपरा शुरू की थी।
ये होंगे कार्यक्रम
मेले में कीर्तन मंडलियों के बुंदेली भजन, रामायण सभाएं, नौटंकी, विराट दंगल, लोकगीत, कवि सम्मेलन आदि कार्यक्रम होते हैं। बृहस्पतिवार को बुंदेली ढांक, गोटों व लोकगीतों का आयोजन होगा। शुक्रवार को नाग पंचमी पर नागों का पूजन। शनिवार को दंगल और रविवार को मेले का समापन होगा।
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अब पहले से ज्यादा लोग आते हैं
90 वर्ष की मुन्नीबाई ने बताया कि मेले में पहले गिनती की दुकानें लगती थीं, लेकिन आज दुकानें बहुत लगती हैं। उनके परिवार ने ही दस दुकानें लगाई है। पहले से ज्यादा लोग आते हैं। खिलौना विक्रेता बुजुर्ग देविका रानी ने बताया कि मेला में पहले की तरह बुंदेली कलाकार आते हैं।
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श्रावण मेले में बुंदेली संस्कृति की झलक
सब हेड: ईसाई टोला के खातीबाबा मंदिर में 1950 से लग रहा है मेला
क्रासर
गोटों और ढांक की गूंजती है धुन, नागों की होती है पूजा
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
अगर आप बुंदेली संस्कृति और लोक कलाओं से रूबरू होना चाहते हैं तो ईसाई टोला में खाती बाबा के मंदिर पर लगने वाले श्रावण मेले में जरूर जाइये। 1950 से लगातार आयोजित इस मेले में आपको गोटों और ढांक की धुन सुनाई देंगी। यहां नागों की पूजा होती है। बुधवार को मेले का विधिवत शुभारंभ हुआ।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की नगरी में कभी नागपंचमी पर लगभग पांच मेला लगते थे, जिनमें गोपाल की बगिया, शंकर सिंह का बगीचा का मेला प्रमुख हैं। दूर-दूर से सपेरे आते थे, नागों की कई प्रजातियों के साथ। लेकिन यह मेले अब नहीं लगते हैं। ईसाईटोला के खाती बाबा मंदिर में नाग पंचमी का मेला आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है। मेला कार्यक्रम संचालक सियाराम शरण चतुर्वेदी और संयोजक भोले कुशवाहा ने बताया कि कभी खातीबाबा क्षेत्र पूरा जंगल था। खातीबाबा के दर्शन और नागपंचमी पर देवता क ी पूजा के लिए जगह-जगह से श्रद्धालु आते थे, जो आज भी जारी हैं। फर्क सिर्फ इतना हैं कि पहले सीमित दुकानें होती थी, आज लगभग 60 से ज्यादा दुकानें लगी हैं। नागपंचमी के दिन मंदिर के पीछे बनी बांबी की श्रद्धालु पूजा करते है। 1950 में बैजनाथ कुशवाहा ने मेले की परंपरा शुरू की थी।
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ये होंगे कार्यक्रम
मेले में कीर्तन मंडलियों के बुंदेली भजन, रामायण सभाएं, नौटंकी, विराट दंगल, लोकगीत, कवि सम्मेलन आदि कार्यक्रम होते हैं। बृहस्पतिवार को बुंदेली ढांक, गोटों व लोकगीतों का आयोजन होगा। शुक्रवार को नाग पंचमी पर नागों का पूजन। शनिवार को दंगल और रविवार को मेले का समापन होगा।
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अब पहले से ज्यादा लोग आते हैं
90 वर्ष की मुन्नीबाई ने बताया कि मेले में पहले गिनती की दुकानें लगती थीं, लेकिन आज दुकानें बहुत लगती हैं। उनके परिवार ने ही दस दुकानें लगाई है। पहले से ज्यादा लोग आते हैं। खिलौना विक्रेता बुजुर्ग देविका रानी ने बताया कि मेला में पहले की तरह बुंदेली कलाकार आते हैं।