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शून्य लागत खेती बुंदेलखंड के अन्य केंद्रों के लिए-Lalitpur
Updated Thu, 27 Sep 2018 02:09 AM IST
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प्राकृतिक खेती में देसी बीज कारगर: पालेकर
- शून्य लागत प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण शिविर का समापन
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। पद्मश्री सुभाष पालेकर ने शून्य लागत प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण देते हुए कहा कि सहजन के पेड़ और अरहर के पौधों के बीच हल्दी, अदरक व मिर्च को उगाया जाए तथा ग्वारफली व सूरजमुखी के बीच अदरक, मिर्च और गेंदा उगाया जाए तो प्राकृतिक खेती की पद्धति से चमत्कारिक उत्पादन मिलता है।
रानी लक्ष्मीबाई पैरा मेडिकल कॉलेज में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने किसानों से कहा कि कभी भी एकल फसल नहीं लेनी चाहिए। मुख्य फसल के साथ सह फसल भी लगानी चाहिए। इस पद्धति में कीटों के नियंत्रण की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि कीट आते ही नहीं हैं। फिर भी जरूरत पड़ने पर गोबर और गोमूत्र, वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, फफूंदनाशक, दशपर्णी आदि का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक खेती में देसी बीज का ही प्रयोग करना चाहिए, हाइब्रिड बीज के परिणाम नहीं मिलते हैं। प्राकृतिक खेती में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग करना चाहिए। जीवाणुयुक्त मिट्टी के लिए बरगद या पीपल के नीचे की मेंढ़ की मिट्टी ही लें। खेत में पौधों पंक्ति की दिशा उत्तर-दक्षिण होनी चाहिए, दलहनी फसलों के साथ सहफसलों की बुवाई करनी चाहिए। पौधों का भोजन उसकी जड़ के निकट ही बनाना चाहिए। यदि किसी दूसरे स्थान पर खाद बनाकर खेतों में डाला जाएगा तो मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु निष्क्रिय हो जाएंगे। इस मौके पर विधायक जवाहर लाल राजपूत, राष्ट्रीय समन्वयक गोपालजी उपाध्याय, समन्वयक आचार्य योगर्षि अविनाश, विभुकांत शाह, सुशील जी, नितिन चौरसिया, डॉ. एसआर गुप्ता, कुंजबिहारी गुप्ता, कैलाश अग्रवाल ने पालेकर को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। संपर्क प्रमुख श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि प्रशिक्षणार्थियों को आज बृहस्पतिवार को मॉडल कृषि फार्मों का भ्रमण कराया जाएगा।
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- शून्य लागत प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण शिविर का समापन
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। पद्मश्री सुभाष पालेकर ने शून्य लागत प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण देते हुए कहा कि सहजन के पेड़ और अरहर के पौधों के बीच हल्दी, अदरक व मिर्च को उगाया जाए तथा ग्वारफली व सूरजमुखी के बीच अदरक, मिर्च और गेंदा उगाया जाए तो प्राकृतिक खेती की पद्धति से चमत्कारिक उत्पादन मिलता है।
रानी लक्ष्मीबाई पैरा मेडिकल कॉलेज में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने किसानों से कहा कि कभी भी एकल फसल नहीं लेनी चाहिए। मुख्य फसल के साथ सह फसल भी लगानी चाहिए। इस पद्धति में कीटों के नियंत्रण की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि कीट आते ही नहीं हैं। फिर भी जरूरत पड़ने पर गोबर और गोमूत्र, वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, फफूंदनाशक, दशपर्णी आदि का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक खेती में देसी बीज का ही प्रयोग करना चाहिए, हाइब्रिड बीज के परिणाम नहीं मिलते हैं। प्राकृतिक खेती में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग करना चाहिए। जीवाणुयुक्त मिट्टी के लिए बरगद या पीपल के नीचे की मेंढ़ की मिट्टी ही लें। खेत में पौधों पंक्ति की दिशा उत्तर-दक्षिण होनी चाहिए, दलहनी फसलों के साथ सहफसलों की बुवाई करनी चाहिए। पौधों का भोजन उसकी जड़ के निकट ही बनाना चाहिए। यदि किसी दूसरे स्थान पर खाद बनाकर खेतों में डाला जाएगा तो मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु निष्क्रिय हो जाएंगे। इस मौके पर विधायक जवाहर लाल राजपूत, राष्ट्रीय समन्वयक गोपालजी उपाध्याय, समन्वयक आचार्य योगर्षि अविनाश, विभुकांत शाह, सुशील जी, नितिन चौरसिया, डॉ. एसआर गुप्ता, कुंजबिहारी गुप्ता, कैलाश अग्रवाल ने पालेकर को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। संपर्क प्रमुख श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि प्रशिक्षणार्थियों को आज बृहस्पतिवार को मॉडल कृषि फार्मों का भ्रमण कराया जाएगा।
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