{"_id":"54995ef30b09bcfe88a097f9fdb06302","slug":"19-coolie-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"19 कुलियों के बिल्ले होंगे जब्त ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
19 कुलियों के बिल्ले होंगे जब्त
ब्यूरो/अमर उजाला,झांसी
Updated Sat, 13 Jun 2015 01:43 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
झांसी। रेल प्रशासन ने आवेदन व प्रपत्रों के सत्यापन के बाद पत्नी का भाई साबित न होने पर रेलवे स्टेशन पर तैनात 19 कुलियों के बिल्ला जब्त करने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश से संबंधित कुलियों में हड़कंप मचा हुआ है। अब वह न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
अगर कोई कुली कार्य करने में असमर्थ है अथवा वृद्ध हो चुका है, ऐसी स्थिति में वह रेलवे बोर्ड के निर्देशानुसार अपने पुत्र, दत्तक पुत्र, नजदीकी रिश्तेदार, भाई, भाई के लड़के या पत्नी के भाई के नाम अपना बिल्ला स्थानांतरण कर सकता है। झांसी रेलवे स्टेशन पर कार्यरत करीब 190 कुलियों में 19 ऐसे कुली हैं, जिन्हें पत्नी का भाई होने के नाते बिल्ला स्थानांतरण किया गया है। रेल प्रशासन ने इन कुलियों द्वारा दिए गए आवेदन व प्रपत्रों के सत्यापन के बाद पाया कि संबंधित कुली पत्नी के भाई होने संबंधी कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद कुली राधे श्याम व अन्य 18 ने न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय ने रेल प्रशासन को कुलियों के अभिलेखों की जांच कर उचित निर्णय लेने के आदेश दिए थे।
मंडल रेल प्रबंधक ने 25 मई 2015 को दिए अपने आदेश में उक्त सभी कुलियों को स्टेशन प्रबंधक के समक्ष बिल्ला जमा करने के आदेश दिए हैं। आदेश में बताया गया है कि रेलवे बोर्ड द्वारा जारी नीति 9 दिसंबर 1988 तथा वर्तमान नीति 29 अक्तूबर 2009 को आधार मानकर आवेदन व प्रपत्रों का सत्यापन कराया गया। दस्तावेजों की जांच में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया जिसमें साबित हो सके कि संबंधित व्यक्ति कुली की पत्नी का भाई है।
विज्ञापन
इधर, कुलियों के नेता रहीश ने कहा कि रेल प्रशासन कुलियों के साथ हठधर्मी दिखा रहा है। यह सभी कुली कई सालों से स्टेशन पर कार्यरत हैं, और पास, पीटीओ आदि सभी सुविधाएं ले रहे हैं। वह जब गलत थे तो उन्हें शुरूआत में ही क्यों नहीं निकाला गया? 9 दिसंबर 1988 की नीति के अनुसार पत्नी के भाई होने का कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं थी, केवल शपथ पत्र लगाना पड़ता था। इन मामलों में भी पति- पत्नी दोनों ने शपथ पत्र लगाए हैं। इसके बाद भी रेल प्रशासन नियमों की अनदेखी कर रहा है। उन्होंने कहा कि यासीन नामक कुली के साथ भी ऐसी स्थिति थी, मगर उसको इस नीति में नहीं डाला गया। रेल प्रशासन अगर अपना निर्णय वापस नहीं लेता है तो उन्हें दुबारा न्यायालय की शरण लेनी होगी।
विज्ञापन
अगर कोई कुली कार्य करने में असमर्थ है अथवा वृद्ध हो चुका है, ऐसी स्थिति में वह रेलवे बोर्ड के निर्देशानुसार अपने पुत्र, दत्तक पुत्र, नजदीकी रिश्तेदार, भाई, भाई के लड़के या पत्नी के भाई के नाम अपना बिल्ला स्थानांतरण कर सकता है। झांसी रेलवे स्टेशन पर कार्यरत करीब 190 कुलियों में 19 ऐसे कुली हैं, जिन्हें पत्नी का भाई होने के नाते बिल्ला स्थानांतरण किया गया है। रेल प्रशासन ने इन कुलियों द्वारा दिए गए आवेदन व प्रपत्रों के सत्यापन के बाद पाया कि संबंधित कुली पत्नी के भाई होने संबंधी कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद कुली राधे श्याम व अन्य 18 ने न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय ने रेल प्रशासन को कुलियों के अभिलेखों की जांच कर उचित निर्णय लेने के आदेश दिए थे।
विज्ञापन
मंडल रेल प्रबंधक ने 25 मई 2015 को दिए अपने आदेश में उक्त सभी कुलियों को स्टेशन प्रबंधक के समक्ष बिल्ला जमा करने के आदेश दिए हैं। आदेश में बताया गया है कि रेलवे बोर्ड द्वारा जारी नीति 9 दिसंबर 1988 तथा वर्तमान नीति 29 अक्तूबर 2009 को आधार मानकर आवेदन व प्रपत्रों का सत्यापन कराया गया। दस्तावेजों की जांच में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया जिसमें साबित हो सके कि संबंधित व्यक्ति कुली की पत्नी का भाई है।
विज्ञापन
इधर, कुलियों के नेता रहीश ने कहा कि रेल प्रशासन कुलियों के साथ हठधर्मी दिखा रहा है। यह सभी कुली कई सालों से स्टेशन पर कार्यरत हैं, और पास, पीटीओ आदि सभी सुविधाएं ले रहे हैं। वह जब गलत थे तो उन्हें शुरूआत में ही क्यों नहीं निकाला गया? 9 दिसंबर 1988 की नीति के अनुसार पत्नी के भाई होने का कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं थी, केवल शपथ पत्र लगाना पड़ता था। इन मामलों में भी पति- पत्नी दोनों ने शपथ पत्र लगाए हैं। इसके बाद भी रेल प्रशासन नियमों की अनदेखी कर रहा है। उन्होंने कहा कि यासीन नामक कुली के साथ भी ऐसी स्थिति थी, मगर उसको इस नीति में नहीं डाला गया। रेल प्रशासन अगर अपना निर्णय वापस नहीं लेता है तो उन्हें दुबारा न्यायालय की शरण लेनी होगी।