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लक्ष्मी मंदिर: लक्ष्मी बाई पर विशेष-City
Updated Sat, 18 Nov 2017 02:54 AM IST
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फोटो
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लक्ष्मी मंदिर से लगाव रखती थीं लक्ष्मीबाई
सब हेड: वीरांगना खुद संभालती थी यहां का प्रबंधन
क्रासर
हर शुक्रवार और दीपावली पर पूजा करने आती थी महारानी
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
लक्ष्मी तालाब के पास मौजूद लक्ष्मी मंदिर से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को बेहद लगाव था। यही कारण है राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद उन्होंने न सिर्फ मंदिर का प्रबंध संभाला, बल्कि मंदिर के खर्चे की पूर्ति खुद करती थीं।
नगर परकोटा के बाहर पूर्व दिशा में मौजूद लक्ष्मी तालाब में कभी बड़ी संख्या में कमल के फूल खिलते थे। इन्हीं कमल के फूलों के बीच स्थित लक्ष्मी मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई प्रत्येक शुक्रवार को सहेलियों के साथ अपने परिवार की कुलदेवी लक्ष्मी जी की पूजा करने आती थी। दीपावली पर पूजन के बाद गरीबों को अन्नदान करती थीं। उस दौरान लक्ष्मी तालाब का पानी लक्ष्मी गेट तक टकराता था। इसके लिए मंदिर तक पहुंचने के लिए रानी और श्रद्धालु नावों का उपयोग करते थे। मंदिर 18 वीं शताब्दी में यहां रहने वाले मराठाओं और अन्य नगर वासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा। इस मंदिर का अस्तित्व एकाएक तब संकट में आया, जब राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई ने परिवार के इस मंदिर का प्रबंध खुद संभाला और अर्थ संकट के बावजूद भी अपने धन से मंदिर की व्यवस्थाएं की। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के युद्ध में अंग्रेजी सेना द्वारा मंदिर में लूटपाट करने के बाद यहां की व्यवस्थाएं बिगड़ गईं।
प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. एसके दुबे ने बताया कि 1988 में यह मंदिर राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन आया। इसके जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ और 13 वे वित्त आयोग के अंतर्गत 10 लाख रुपये की लागत से जेटपंप, टायलेट, स्वच्छ पेयजल के लिए आरो लगा और जीर्णोद्धार कराया। अब शिखर के जीर्णोद्धार की योजना है।
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सूबेदार रघुनाथ राव ने कराया था निर्माण
लक्ष्मी मंदिर का निर्माण राजा गंगाधर राव के पूर्वज नेवालकर राजवंश के सूबेदार रघुनाथराव द्वितीय 1769 से 1796 के बीच में कराया था। दो मंजिल मंदिर के गर्भगृह में उन्होंने अपनी कुलदेवी महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कराई। मंदिर के परिसर में दीप स्तंभ है। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. एसके दुबे ने बताया कि मंदिर राजमहल नुमा स्थापत्य शैली में है और इसके निर्माण मेंलाखौरी ईंट व पत्थर लगे है। मंदिर के छज्जा में बने कंगूरों के बीच पशु पक्षी आकृतियां हैं। इस मंदिर में मां लक्ष्मी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कोल्हापुर के लक्ष्मी मंदिर के पंडितों ने कराई थी। इसलिए इसे कोल्हापुर लक्ष्मी मंदिर की शाखा भी कहा जाता है।
गोरामछिया और कोछांभावर से चलता था मंदिर का खर्चा
राजा गंगाधर राव ने इस मंदिर के प्रबंध के लिए 4900 नानाशाही (उस समय की मुद्रा) राजस्व की आमदनी वाले दो गांव कोछांभावर और गोरामछिया मां लक्ष्मी को अर्पित किए थे। डा. रुद्र पांडेय की पुस्तक झांसी के अनुसार सनदजारी करके राजा गंगाधर राव ने इस मंदिर का संपूर्ण प्रबंध झांसी के शासक परिवार को सौंप दिया। हालांकि झांसी राज्य के विलय के बाद ब्रिटिश कंपनी सरकार ने गांवों को अधिग्रहीत कर लिया था।
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लक्ष्मी मंदिर से लगाव रखती थीं लक्ष्मीबाई
सब हेड: वीरांगना खुद संभालती थी यहां का प्रबंधन
क्रासर
हर शुक्रवार और दीपावली पर पूजा करने आती थी महारानी
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
लक्ष्मी तालाब के पास मौजूद लक्ष्मी मंदिर से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को बेहद लगाव था। यही कारण है राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद उन्होंने न सिर्फ मंदिर का प्रबंध संभाला, बल्कि मंदिर के खर्चे की पूर्ति खुद करती थीं।
नगर परकोटा के बाहर पूर्व दिशा में मौजूद लक्ष्मी तालाब में कभी बड़ी संख्या में कमल के फूल खिलते थे। इन्हीं कमल के फूलों के बीच स्थित लक्ष्मी मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई प्रत्येक शुक्रवार को सहेलियों के साथ अपने परिवार की कुलदेवी लक्ष्मी जी की पूजा करने आती थी। दीपावली पर पूजन के बाद गरीबों को अन्नदान करती थीं। उस दौरान लक्ष्मी तालाब का पानी लक्ष्मी गेट तक टकराता था। इसके लिए मंदिर तक पहुंचने के लिए रानी और श्रद्धालु नावों का उपयोग करते थे। मंदिर 18 वीं शताब्दी में यहां रहने वाले मराठाओं और अन्य नगर वासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा। इस मंदिर का अस्तित्व एकाएक तब संकट में आया, जब राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई ने परिवार के इस मंदिर का प्रबंध खुद संभाला और अर्थ संकट के बावजूद भी अपने धन से मंदिर की व्यवस्थाएं की। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के युद्ध में अंग्रेजी सेना द्वारा मंदिर में लूटपाट करने के बाद यहां की व्यवस्थाएं बिगड़ गईं।
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प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. एसके दुबे ने बताया कि 1988 में यह मंदिर राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन आया। इसके जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ और 13 वे वित्त आयोग के अंतर्गत 10 लाख रुपये की लागत से जेटपंप, टायलेट, स्वच्छ पेयजल के लिए आरो लगा और जीर्णोद्धार कराया। अब शिखर के जीर्णोद्धार की योजना है।
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सूबेदार रघुनाथ राव ने कराया था निर्माण
लक्ष्मी मंदिर का निर्माण राजा गंगाधर राव के पूर्वज नेवालकर राजवंश के सूबेदार रघुनाथराव द्वितीय 1769 से 1796 के बीच में कराया था। दो मंजिल मंदिर के गर्भगृह में उन्होंने अपनी कुलदेवी महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कराई। मंदिर के परिसर में दीप स्तंभ है। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. एसके दुबे ने बताया कि मंदिर राजमहल नुमा स्थापत्य शैली में है और इसके निर्माण मेंलाखौरी ईंट व पत्थर लगे है। मंदिर के छज्जा में बने कंगूरों के बीच पशु पक्षी आकृतियां हैं। इस मंदिर में मां लक्ष्मी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कोल्हापुर के लक्ष्मी मंदिर के पंडितों ने कराई थी। इसलिए इसे कोल्हापुर लक्ष्मी मंदिर की शाखा भी कहा जाता है।
गोरामछिया और कोछांभावर से चलता था मंदिर का खर्चा
राजा गंगाधर राव ने इस मंदिर के प्रबंध के लिए 4900 नानाशाही (उस समय की मुद्रा) राजस्व की आमदनी वाले दो गांव कोछांभावर और गोरामछिया मां लक्ष्मी को अर्पित किए थे। डा. रुद्र पांडेय की पुस्तक झांसी के अनुसार सनदजारी करके राजा गंगाधर राव ने इस मंदिर का संपूर्ण प्रबंध झांसी के शासक परिवार को सौंप दिया। हालांकि झांसी राज्य के विलय के बाद ब्रिटिश कंपनी सरकार ने गांवों को अधिग्रहीत कर लिया था।