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पहली शब-ए-कद्र पर गुलजार रहीं मस्जिदें
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पहली शब-ए-कद्र पर गुलजार रहीं मस्जिदें
झांसी। माहे रमजान का आखिरी अशरा शुरू हो गया है। पहली शब-ए-कद्र पर लोगों ने मस्जिदों में इबादत की। इस दौरान लोगों ने जहन्नुम से आजादी की दुआ मांगी। मुकद्दस रमजान को इबादतों का महीना कहा जाता है। इस महीने में लोग रोजा रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं।
रमजान के महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा अर्थात पहले रोजे से दसवें रोजे तक होता है। दूसरा अशरा ग्यारहवा रोजे से बीस रोजे तक व तीसरा व आखिरी अशरा इक्कीसवे रोजे से ईद का चांद दिखने तक होता है। रविवार को रमजान के बीस रोजे पूरे होने पर दो अशरे पूरे हो गए। तीसरा अशरा शुरू हो गया है। इस अशरे में रोजेदार रोजे रखकर अल्लाह से जहन्नुम से अजादी की दुआ मांगते हैं।
मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि आखरी अशरे को जहन्नुम से आजादी का अशरा कहा जाता है। इस अशरे में एक ऐसी रात होती है जो हजार महीनों की इबादत से भी बेहतर होती है। इस रात को लैलतुलकद्र कहा जाता है। इस रात को पाने के लिए लोग पांच रातों (21, 23, 25, 27, 29 ) को इबादत करते हैं जिससे की इस रात की इबादत हो सके और अल्लाह तआला इबादत की बरकत से गुनाहों को माफ कर दें।
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इस अशरे में होता है एतकाफ
आखिरी अशरे में मुस्लिम पुरुष व महिलाएं एतकाफ करती है। पुरुष मस्जिद में व औरतें घरों में ही अकेला रहकर अल्लाहकी इबादत करती हैं। इस दौरान पुरुष व महिलाएं इबादत के अलावा कोई अन्य काम नहीं करती हैं।
झांसी। माहे रमजान का आखिरी अशरा शुरू हो गया है। पहली शब-ए-कद्र पर लोगों ने मस्जिदों में इबादत की। इस दौरान लोगों ने जहन्नुम से आजादी की दुआ मांगी। मुकद्दस रमजान को इबादतों का महीना कहा जाता है। इस महीने में लोग रोजा रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं।
रमजान के महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा अर्थात पहले रोजे से दसवें रोजे तक होता है। दूसरा अशरा ग्यारहवा रोजे से बीस रोजे तक व तीसरा व आखिरी अशरा इक्कीसवे रोजे से ईद का चांद दिखने तक होता है। रविवार को रमजान के बीस रोजे पूरे होने पर दो अशरे पूरे हो गए। तीसरा अशरा शुरू हो गया है। इस अशरे में रोजेदार रोजे रखकर अल्लाह से जहन्नुम से अजादी की दुआ मांगते हैं।
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मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि आखरी अशरे को जहन्नुम से आजादी का अशरा कहा जाता है। इस अशरे में एक ऐसी रात होती है जो हजार महीनों की इबादत से भी बेहतर होती है। इस रात को लैलतुलकद्र कहा जाता है। इस रात को पाने के लिए लोग पांच रातों (21, 23, 25, 27, 29 ) को इबादत करते हैं जिससे की इस रात की इबादत हो सके और अल्लाह तआला इबादत की बरकत से गुनाहों को माफ कर दें।
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इस अशरे में होता है एतकाफ
आखिरी अशरे में मुस्लिम पुरुष व महिलाएं एतकाफ करती है। पुरुष मस्जिद में व औरतें घरों में ही अकेला रहकर अल्लाहकी इबादत करती हैं। इस दौरान पुरुष व महिलाएं इबादत के अलावा कोई अन्य काम नहीं करती हैं।