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इमाम हसन की याद में निकला 28 सफर का जुलूस
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर
Updated Mon, 22 Dec 2014 11:49 PM IST
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28 सफ र का कदीमी जुलूस सोमवार को मखदूम शाहअढ़न मोहल्ला स्थित इमामबारगाह से निकाला गया। इस दौरान ताजिया, शबीहे ताबूत और अलम मुबारक के साथ नगर की सभी अंजुमनों ने नौहा मातम किया।
जुलूस अपने कदीमी रास्ते से होता हुआ कोतवाली चौराहे पहुंचा, जहां मातमी दस्तों ने जंजीर और कमा का मातम किया। इसके बाद जुलूस बड़ी मस्जिद, पुरानी बाजार होता हुआ बेगमगंज स्थित सदर इमामबाड़ा पहुंचा जहां शबीहे
ताबूत, आलम ठंडा किया गया और ताजिये को सुपुर्दे खाक किया गया। इसके पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत सोजखानी से हुई। डा स़ैय्यद कमर अब्बास ने मजलिस को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कायनात के रसूल हजरत मोहम्मद
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मुस्तफा और उनके नवासे इमाम हसन के जीवन पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल ने अपनी पूरी जिंदगी इस्लाम को फैलाया, लेकिन आखिरी वक्त में जब उन्होंने तहरीर लिखने के लिए कलम और दवात
मांगी तो उन्हीं लोगों ने देने से इनकार कर दिया, जो उनके साथ जाहिरी तौर पर नजदीकियां बनाए हुए थे।
कहा कि मोहम्मद का मर्तबा इसी से समझा जा सकता है कि मौत का वह फरिश्ता जो जब चाहे, जहां चाहे जाकर
इंसान की रूह कब्ज कर ले, लेकिन वह बार-बार कुंडी खटखटाता रहा और इजाजत मांगता रहा। जब रसूल ने अपनी बेटी फातेमा से कहा कि बेटी यह मौत का फरिश्ता है और मेरा आखिरी वक्त है इसे इजाजत दे दो और फातेमा ने
इजाजत दी, तब वह दाखिल हुआ, लेकिन उसी मोहम्मद के नवासों को दुनिया ने चैन से रहने नहीं दिया।
बड़े नवासे इमाम हसन को जब छह बार जहर देकर भी नहीं मारा जा सका तो सातवीं बार ऐसा जहर लाया गया,
जिसकी एक बूंद दुनिया के सभी समुंदरों के जीवों को मारने के लिए काफी था। वह जहर इमाम के पानी में उनकी एक पत्नी द्वारा मिला दिया गया, जिसे पीने के बाद उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं और शहीद हो गए।
शहादत के बाद जब जनाजा जन्नतुल बकी दफन के लिए ले जाया गया तो लोगों ने जनाजे पर तीरों की बारिश कर दी और सात तीर इमाम के जनाने पर लगे और यह दुनिया का पहला ऐसा जनाजा था, जो कब्रिस्तान जाने के बाद
पुन: घर वापस आया। मजलिस के बाद शबीहे अलम बरामद हुआ इमाम चौक पर रखा गया शबीहे ताबूत और ताजिया उठाया गया। इसके हमराह अंजुमनों ने नौहा और मातम शुरू किया।
मखदूम शाह अढ़न से उठा यह जुलूस अपने कदीमी रास्तों से गुजरता हुआ कोतवाली तिराहे पर पहुंचा जहां जंजीर से मातम किया गया। जुलूस मल्हनी रोड, पुरानी बाजार से होकर सदर इमामबारगाह बेगमगंज पहुंचा, जहां नौहा और
मातम के साथ जुलूस ठंडा किया गया। इसी क्रम में मुफ्ती हाउस के इमामबाड़े में भी मजलिस का आयोजन किया गया, जिसके बाद यह तारीखी जुलूस उठाया गया। हमराह अंजुमन सज्जादिया मुफ्ती मोहल्ला ने नौहा और मातम
किया। बख्शा: क्षेत्र के रन्नो और कर्तिहां गांव में 28 सफर का कदीमी जुलूस अपने रेवायती अंदाज में निकाला गया। इसके पूर्व सभी गांवों के इमामबाड़ों में मजलिस हुई।
इसके बाद शबीहे ताबूत इमामचौक पर रखा गया। सोमवार की सुबह सभी गांव के लोग अपनी—अपनी अंजुमनों के साथ नौहा व मातम करते हुए उत्तर पट्टी स्थित कर्बला पर पहुंचे जहां जुलूस ठंडा किया गया। इसी क्रम में कर्तिहा गांव में भी जुलूस का आयोजन किया गया। स्थानीय अंजुमन द्वारा नौहा मातम के साथ जुलूस कर्बला पहुंच कर ठंडा किया गया।
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जुलूस अपने कदीमी रास्ते से होता हुआ कोतवाली चौराहे पहुंचा, जहां मातमी दस्तों ने जंजीर और कमा का मातम किया। इसके बाद जुलूस बड़ी मस्जिद, पुरानी बाजार होता हुआ बेगमगंज स्थित सदर इमामबाड़ा पहुंचा जहां शबीहे
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ताबूत, आलम ठंडा किया गया और ताजिये को सुपुर्दे खाक किया गया। इसके पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत सोजखानी से हुई। डा स़ैय्यद कमर अब्बास ने मजलिस को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कायनात के रसूल हजरत मोहम्मद
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मुस्तफा और उनके नवासे इमाम हसन के जीवन पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल ने अपनी पूरी जिंदगी इस्लाम को फैलाया, लेकिन आखिरी वक्त में जब उन्होंने तहरीर लिखने के लिए कलम और दवात
मांगी तो उन्हीं लोगों ने देने से इनकार कर दिया, जो उनके साथ जाहिरी तौर पर नजदीकियां बनाए हुए थे।
कहा कि मोहम्मद का मर्तबा इसी से समझा जा सकता है कि मौत का वह फरिश्ता जो जब चाहे, जहां चाहे जाकर
इंसान की रूह कब्ज कर ले, लेकिन वह बार-बार कुंडी खटखटाता रहा और इजाजत मांगता रहा। जब रसूल ने अपनी बेटी फातेमा से कहा कि बेटी यह मौत का फरिश्ता है और मेरा आखिरी वक्त है इसे इजाजत दे दो और फातेमा ने
इजाजत दी, तब वह दाखिल हुआ, लेकिन उसी मोहम्मद के नवासों को दुनिया ने चैन से रहने नहीं दिया।
बड़े नवासे इमाम हसन को जब छह बार जहर देकर भी नहीं मारा जा सका तो सातवीं बार ऐसा जहर लाया गया,
जिसकी एक बूंद दुनिया के सभी समुंदरों के जीवों को मारने के लिए काफी था। वह जहर इमाम के पानी में उनकी एक पत्नी द्वारा मिला दिया गया, जिसे पीने के बाद उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं और शहीद हो गए।
शहादत के बाद जब जनाजा जन्नतुल बकी दफन के लिए ले जाया गया तो लोगों ने जनाजे पर तीरों की बारिश कर दी और सात तीर इमाम के जनाने पर लगे और यह दुनिया का पहला ऐसा जनाजा था, जो कब्रिस्तान जाने के बाद
पुन: घर वापस आया। मजलिस के बाद शबीहे अलम बरामद हुआ इमाम चौक पर रखा गया शबीहे ताबूत और ताजिया उठाया गया। इसके हमराह अंजुमनों ने नौहा और मातम शुरू किया।
मखदूम शाह अढ़न से उठा यह जुलूस अपने कदीमी रास्तों से गुजरता हुआ कोतवाली तिराहे पर पहुंचा जहां जंजीर से मातम किया गया। जुलूस मल्हनी रोड, पुरानी बाजार से होकर सदर इमामबारगाह बेगमगंज पहुंचा, जहां नौहा और
मातम के साथ जुलूस ठंडा किया गया। इसी क्रम में मुफ्ती हाउस के इमामबाड़े में भी मजलिस का आयोजन किया गया, जिसके बाद यह तारीखी जुलूस उठाया गया। हमराह अंजुमन सज्जादिया मुफ्ती मोहल्ला ने नौहा और मातम
किया। बख्शा: क्षेत्र के रन्नो और कर्तिहां गांव में 28 सफर का कदीमी जुलूस अपने रेवायती अंदाज में निकाला गया। इसके पूर्व सभी गांवों के इमामबाड़ों में मजलिस हुई।
इसके बाद शबीहे ताबूत इमामचौक पर रखा गया। सोमवार की सुबह सभी गांव के लोग अपनी—अपनी अंजुमनों के साथ नौहा व मातम करते हुए उत्तर पट्टी स्थित कर्बला पर पहुंचे जहां जुलूस ठंडा किया गया। इसी क्रम में कर्तिहा गांव में भी जुलूस का आयोजन किया गया। स्थानीय अंजुमन द्वारा नौहा मातम के साथ जुलूस कर्बला पहुंच कर ठंडा किया गया।