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सीडा की दो सौ फैक्ट्रियों में लग गया ताला
अमर उजाला ब्यूरो, जौनपुर
Updated Thu, 20 Aug 2015 12:48 AM IST
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1988 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने जब सतहरिया में उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन (यूपीएसआईडीसी ) की स्थापना की थी तो उद्यमियों के अलावा जिले के तमाम बेरोजगारों में भी विकास की नई उम्मीद
जगी थी। देखते ही देखते कई फैक्ट्रियां स्थापित हो गईं और जिले के एक मात्र औद्योगिक क्षेत्र के विकास की गति भी तेजी पकड़ती गई। 1996 में सीडा ( सतहरिया औद्योगिक विकास प्राधिकरण) की स्थापना कर दी गई। लेकिन सीडा के
विकास को लेकर उद्यमियों और तमाम बेरोजगारों ने जो उम्मीदें पाल रखी थी वह अधिक दिनों तक स्थाई नहीं रह सकीं।
2005 के आसपास से सीडा के विकास पर ग्रहण लग गया। फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, नए उद्यमी इधर का रुख करना छोड़
दिया। आज हालात ऐसे बन आए कि सीडा की तकरीबन 200 फैक्ट्रियों में ताला लग गया। पिछले तीन साल से एक भी प्लाट का आवंटन नहीं हुआ। 198 फैक्ट्रियां यहां आज भी चालू हालत में जरूर हैं पर वे भी उपेक्षा का दंश झेल रही हैं।
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उद्यमियों की मानें तो सरकार और प्रशासन से जिस सहयोग की अपेक्षा के साथ उन्होंने यहां फैक्ट्री लगाई थी वह सहयोग उन्हें नहीं मिला। उलटे उनपर तमाम तरह के कर लाद दिए गए और कई शर्तों के साथ उन्हें बांध दिया गया।
इसी वजह से उद्यमी सीडा की तरफ से मुंह मोड़ने लगे। 2005 के बाद से निर्मल आर्गेनिक, जौनपुर टेक्सटाइल्स, बालाजी ऊलेन और अभय पिगमेंट जैसी तकरीबन 200 फैक्ट्रियां बंद हो गईं।
उद्यमियों की मानें तो सतहरिया औद्योगिक क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। बीएसएनएल का ब्राडबैंड अक्सर फेल रहता है। फैक्ट्रियों के तमाम काम इंटरनेट पर ही निर्भर होते हैं। सड़कें खराब हैं। पानी निकासी की व्यवस्था ठीक नहीं है। उद्यमियों को बैंकों से मदद नहीं मिल पा रही है।
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जगी थी। देखते ही देखते कई फैक्ट्रियां स्थापित हो गईं और जिले के एक मात्र औद्योगिक क्षेत्र के विकास की गति भी तेजी पकड़ती गई। 1996 में सीडा ( सतहरिया औद्योगिक विकास प्राधिकरण) की स्थापना कर दी गई। लेकिन सीडा के
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विकास को लेकर उद्यमियों और तमाम बेरोजगारों ने जो उम्मीदें पाल रखी थी वह अधिक दिनों तक स्थाई नहीं रह सकीं।
2005 के आसपास से सीडा के विकास पर ग्रहण लग गया। फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, नए उद्यमी इधर का रुख करना छोड़
दिया। आज हालात ऐसे बन आए कि सीडा की तकरीबन 200 फैक्ट्रियों में ताला लग गया। पिछले तीन साल से एक भी प्लाट का आवंटन नहीं हुआ। 198 फैक्ट्रियां यहां आज भी चालू हालत में जरूर हैं पर वे भी उपेक्षा का दंश झेल रही हैं।
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उद्यमियों की मानें तो सरकार और प्रशासन से जिस सहयोग की अपेक्षा के साथ उन्होंने यहां फैक्ट्री लगाई थी वह सहयोग उन्हें नहीं मिला। उलटे उनपर तमाम तरह के कर लाद दिए गए और कई शर्तों के साथ उन्हें बांध दिया गया।
इसी वजह से उद्यमी सीडा की तरफ से मुंह मोड़ने लगे। 2005 के बाद से निर्मल आर्गेनिक, जौनपुर टेक्सटाइल्स, बालाजी ऊलेन और अभय पिगमेंट जैसी तकरीबन 200 फैक्ट्रियां बंद हो गईं।
उद्यमियों की मानें तो सतहरिया औद्योगिक क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। बीएसएनएल का ब्राडबैंड अक्सर फेल रहता है। फैक्ट्रियों के तमाम काम इंटरनेट पर ही निर्भर होते हैं। सड़कें खराब हैं। पानी निकासी की व्यवस्था ठीक नहीं है। उद्यमियों को बैंकों से मदद नहीं मिल पा रही है।