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भ्रष्टाचार की नींव पर बना सिटी टॉवर
jaunpur
Updated Sun, 25 Jun 2017 12:44 AM IST
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वाजिदपुर तिराहे के पास बना सिटी टाॅवर।
- फोटो : jaunpur
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शहर के वाजिदपुर तिराहे पर वाराणसी के रजिस्ट्री विभाग में तैनात लिपिक ने बिना मानचित्र स्वीकृत कराए सात मंजिली इमारत खड़ी कर ली है। इस निर्माण को 2006 में अवैध घोषित करने के बाद इसे ध्वस्त करने तक का आदेश हो चुका है। कमिश्नर के यथास्थिति रखने के आदेश के बाद भी निर्माण कार्य धड़ल्ले से चल रहा है।
वाजिदपुर तिराहे पर बन रहे सिटी टावर का निर्माण एक अगस्त, 2005 को शुरू हुआ। 30 अगस्त, 2005 को हवेली जासोपुर निवासी गिरजा सिंह पत्नी दयानाथ सिंह ने नगर मजिस्ट्रेट/नियत प्राधिकारी विनियमित क्षेत्र को पत्र देकर शिकायत की थी कि कुछ लोग बिना नक्शा पास कराए नाले पर निर्माण करा रहे हैं।
इससे नाले का बहाव रुक गया है। तत्कालीन ईओ और सिटी मजिस्ट्रेट ने काम रुकवा दिया। 12 सितंबर, 2005 को इस भवन का नक्शा पास कराने के लिए देवेंद्र कुमार मिश्र की तरफ से प्रार्थनापत्र दिया गया। आठ मार्च, 2006 को नियत प्राधिकारी ने यूपी निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम की धारा 10 के तहत केस दर्ज कर निर्माण को अवैध घोषित कर दिया। बावजूद इसके निर्माण चलता रहा।
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आदेश की अवहेलना करने पर नियत प्राधिकारी ने 25 मई, 2006 को भूतल पर बिना नक्शा पास कराए निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश पारित कर दिया।
इसके बाद देवेंद्र मिश्र ने शासन में अपील की। इसकी सुनवाई के बाद तत्कालीन डीएम अपर्णा यू ने पत्रावली कंट्रोलिंग अथारिटी के समक्ष रखने का आदेश दिया।
इस बीच भी निर्माण कार्य दिन-रात चलता रहा। एक सितंबर, 2012 को कंट्रोलिंग अथारिटी बोर्ड ने ध्वस्तीकरण आदेश को बहाल कर दिया। इस आदेश के खिलाफ नवंबर 2012 में देवेेंद्र मिश्र ने कमिश्नर के यहां अपील की तो तत्कालीन कमिश्नर चंचल कुमार तिवारी ने 10 दिसंबर, 2012 को पत्रावली पेश करने का आदेश दिया। तब से पूरा मामला ठप है। पांच साल गुजरने को आया लेकिन इसके बाद भी कमिश्नर के यहां से अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ। इधर, सात मंजिला भवन बनकर तैयार हो गया है और आठवीं मंजिल का निर्माण शुरू है।
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वाजिदपुर तिराहे पर बन रहे सिटी टावर का निर्माण एक अगस्त, 2005 को शुरू हुआ। 30 अगस्त, 2005 को हवेली जासोपुर निवासी गिरजा सिंह पत्नी दयानाथ सिंह ने नगर मजिस्ट्रेट/नियत प्राधिकारी विनियमित क्षेत्र को पत्र देकर शिकायत की थी कि कुछ लोग बिना नक्शा पास कराए नाले पर निर्माण करा रहे हैं।
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इससे नाले का बहाव रुक गया है। तत्कालीन ईओ और सिटी मजिस्ट्रेट ने काम रुकवा दिया। 12 सितंबर, 2005 को इस भवन का नक्शा पास कराने के लिए देवेंद्र कुमार मिश्र की तरफ से प्रार्थनापत्र दिया गया। आठ मार्च, 2006 को नियत प्राधिकारी ने यूपी निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम की धारा 10 के तहत केस दर्ज कर निर्माण को अवैध घोषित कर दिया। बावजूद इसके निर्माण चलता रहा।
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आदेश की अवहेलना करने पर नियत प्राधिकारी ने 25 मई, 2006 को भूतल पर बिना नक्शा पास कराए निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश पारित कर दिया।
इसके बाद देवेंद्र मिश्र ने शासन में अपील की। इसकी सुनवाई के बाद तत्कालीन डीएम अपर्णा यू ने पत्रावली कंट्रोलिंग अथारिटी के समक्ष रखने का आदेश दिया।
इस बीच भी निर्माण कार्य दिन-रात चलता रहा। एक सितंबर, 2012 को कंट्रोलिंग अथारिटी बोर्ड ने ध्वस्तीकरण आदेश को बहाल कर दिया। इस आदेश के खिलाफ नवंबर 2012 में देवेेंद्र मिश्र ने कमिश्नर के यहां अपील की तो तत्कालीन कमिश्नर चंचल कुमार तिवारी ने 10 दिसंबर, 2012 को पत्रावली पेश करने का आदेश दिया। तब से पूरा मामला ठप है। पांच साल गुजरने को आया लेकिन इसके बाद भी कमिश्नर के यहां से अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ। इधर, सात मंजिला भवन बनकर तैयार हो गया है और आठवीं मंजिल का निर्माण शुरू है।