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रामराज्य में ऊंच नीच का नहीं था भेदभाव
Updated Thu, 04 Oct 2018 01:05 AM IST
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बरईपार। बाल व्यास स्वाति शुक्ल ने भगवान राम के जन्म के मार्मिक कथा का वर्णन करते हुए कहा कि अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र भगवान राम थे। दशरथ की तीन पत्नियां कौशल्या, सुमीत्रा और कैेकेयी थी। भगवान राम ने 14 वर्ष वन में रहकर भारत भर में भ्रमण कर भारतीय आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश फैलाया। यही कारण रहा की राम का जब रावण से युद्ध हुआ तो सभी जातियों ने राम का साथ दिया। यह वह काल था जबकि लोगों में किसी भी प्रकार की जातिवादी सोच नहीं थी। लोग सिर्फ दो तरह की सोच में ही बंटे थे- सुर और असुर। जिन्हें देव और दैत्य कहा जाता था। सुर के सहयोगी यक्ष, गंधर्व, वानर आदि थे। तो असुरों के सहयोगी राक्षस, दानव, पिशाच आदि थे। वनवास के दौरान लक्ष्मण ने रावण की बहिन सूपर्णखा की नाक काट दी थी। सीता स्वयंवर में अपनी हार और सूपर्णखा की नाक काटने का बदला लेने के लिए रावण ने सीता का हरण कर लिया। वनवास के दौरान ही राम को सीता से दो पुत्र प्राप्त हुए लव और कुश। एक शोधानुसार लव और कुश की 50 वीं पीढ़ी में शल्य हुए जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। राम ने सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए संपाति, हनुमान, सुग्रीव, विभिषण, मैन्द, द्विविद, जाम्बवंत, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन (गवाक्ष), दधिमुख, गवय और गन्धमादन आदि की सहायता से सेतु बनाया और लंका पर चढ़ाई कर दी। लंका में घोर युद्ध हुआ और पराक्रमी रावण का वध हो गया। तब पुष्पक विमान द्वारा रावण सीता सहित पुन: अयोध्या आ गए। इसके पूर्व आयोजक हरिशंकर शुक्ल ने वाचक का माल्यापर्ण किया। कथा वाचक प्रकाश चंद पांडेय ने हनुमान चरित्र पर और चित्रकूट आयी संत नीलम, गायत्री ने भरत के चरित्र पर प्रकाश डाला। इस मौके पर जितेंद्र शुक्ल, श्याम जी मिश्र, पपू सिंह आदि मौजूद रहे।