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दस सालों में समाप्त हो गया नदी के जल का श्रोत
Updated Mon, 05 Mar 2018 12:35 AM IST
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गोमती
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जौनपुर। भू-गर्भजल स्तर तेजी से नीचे खिसक रहा है। हालात यही रहे ते आने वाले समय में लोगों को पेयजल के गंभीर संकट से जूझना होगा। बारिश लगातार कम हो रही है। धरती का सीनी चीर कर पानी निकालने के संसाधन तो खूब बढ़े पर पानी से खाली हो रही धरती की कोख भरने के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हुए। वाटर लेबल रीचार्ज करने के लिए सरकार की ओर से जो योजनाएं चलाई भी जा रही उनका धरातल पर कहीं अता पता नहीं है। पांच नदियों वाले इस जिले की गोमती नदी को छोड़ चार नदियां पूरी तरह सूख गई हैं। नदी के किनारे के गावों में भी जल स्तर तेजी से नीचे खिसक रहा है। कुएं पहले से ही सूख चुके हैं अब जहां तहां इंडिया मार्का टू हैंडपंप भी जवाब दे रहे हैं।
लगातार नीचे खिसकते जल स्तर का आलम यह है कि 21 विकास खंडों वाले इस जिले के 11 ब्लाक डार्कजोन घोषित किए जा चुके हैं। डार्क जोन वाले विकास खंडों में पानी जमीन की ऊपरी सतह से 90 फीट से 120 फीट नीचे चला गया है। जो विकास खंड डार्क जोन में नहीं हैं वहां भी पानी का स्तर निरंतर नीचे खिसक रहा है। सामान्य ब्लाकों में जहां वर्ष 2009-10 में 35 से 40 फीट नीचे पानी मिल जाता था उन्हीं विकास खंडों में अब 65 से 70 फीट नीचे पानी की सतह है। यानी आठ सालों के दरम्यान पानी का स्तर 20 फीट तक नीचे खिसक गया। हालांकि नहरों से घिरे बरसठी और धर्मापुर ब्लाक इसी साल डार्कजोन से बाहर हुए हैं। जिले में सई, गोमती, पीली, बसुई और बरुणा पांच प्रमुख नदियां हैं। जिसमें गोमती नदी को छोड़ सभी नदियां सूख चुकी हैं। गोमती नदी का भी जल स्तर लगातार घट रहा है। शहर में शाही पुल के आगे गोमती नदी नाले की शक्ल में तब्दील हो चुकी है। जिससे नदी के किनारे वाले गांवों में भी जल जल स्तर नीचे खिसक गया है।
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बिना रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के पास कर दिया जा रहा नक्शा
जौनपुर। वाटर लेबल रीचार्ज करने के लिए सभी सरकारी और गैर सरकारी भवनों पर रेन वाटर हावेस्टिंग सिस्टम को वर्ष 2006 से अनिवार्य किया गया है। लेकिन शहर में हर साल बड़ी संख्या में भवनों का निर्माण हो रहा है लेकिन उनका नक्शा बिना मानक पूरा किए ही पास कर दिया जा रहा है।
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पानी का मनमानी दोहन कर रहे आरओ प्लांट
जौनपुर। शहर से लेकर गांव तक जगह-जगह आरओ प्लांट स्थापित हो गए हैं। इन आरओ प्लांट से 70 फीसदी पानी बर्बाद होने के बाद महज तीस फीसदी पानी पीने लायक बनाया जाता है। बाकी पानी जो वेस्ट होता है उसे जमीन के अंदर डालने की भी कोई व्यवस्था इन आरो प्लांट संचालकों की ओर से नहीं की गई है। इनके पास न तो कोई लाइसेंस है और न ही वे मानक ही पूरा कर रहे हैं।
जिले में 930 किमी लंबा सफर तय करती है गोमती
जौनपुर। गोमती नदी प्रदेश की भूजल आधारित नदी है। यह नदी पीलीभीत जनपद के माधोटांडा स्थित गोमत ताल जिसे फुल्लर झील के नाम से भी जाना जाता है वही से निकलती हैं। 10 जिलों से होती हुई 930 किमी का लंबा सफर तय करते हुए गाजीपुर स्थित कैथी में मार्कण्डेय महादेव के पास गंगा में समाहित हो जाती हैं। यह नदी भूजल आधारित है इसलिए इसके उद्गम स्थल पीलीभीत में इसके स्रोत पर ही सबकुछ निर्भर है। किंतु विगत 10 वर्षों में दुर्भाग्य स्वरूप उपरोक्त गोमत ताल पूरी तरह से सूखने के कगार पर पहुंच चुका है। जिससे नदी में जल स्तर दिन प्रतिदिन गिरता ही जा रहा है। गोमत ताल अपने वास्तविक स्थिति से 80 प्रतिशत सूख चुकी है।
क्या कहते हैं जानकार--
-- सिंचाई विभाग के रिटायर्ड अधिशासी अभियंता उमाकांत तिवारी का कहना है कि नदियों में पानी सूखने की मुख्य वजह पानी एकत्रित होने वाले स्रोतों को समतल बना दिया गया है। स्रोत सूख गए हैं। बरसात का पानी तालाब व पोखरों में इकट्ठा नहीं हो पाता। उन्हें पाट दिए गए हैं। अब नदियां सिर्फ बरसात आधारित रह गई हैँ। नदी को जहां पानी चाहिए वहीं पानी की निकासी होने से ऐसी स्थिति बनी है।
-- पूर्वांचल विश्वविद्यालय के इनवायरमेंटल साइंस के सुधीर उपाध्याय का कहना है कि सिंचाई में जमीन का पानी का दोहन हो रहा है। यही कारण है कि पानी का लेबल तेजी से नीचे भाग रहा है। नदियां सूख रही हैं और धीरे-धीरे एक्सपर्ट जोन में पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि नदियों का बहाव कम हो गया है। गहराई भी नहीं रह गई है। शहर के डोमेस्टिक सीवेज नदियों में फेंका जा रहा है।
खाली हो रही धरती की कोख
जौनपुर। भू-गर्भजल दोहन के लिए संसाधन लगातार बढ़ रहे लेकिन जमीन के अंदर पानी डालने का कोई इंतजाम नहीं किया जा रहा। पहले पानी की जरूरतें लोग कुएं से पूरी करते थे लेकिन अब हालात यह हैं कि मकान बनने से पहले बोरिंग होती है और सबमर्सिबल लग जाता है। ऐसे में पानी की जो जरूरत एक से दो बाल्टी में पूरी हो जाती थी उसी के लिए अब पचासों बाल्टी पानी बर्बाद कर दिया जाता है। पहले अधिकतर जमीन कच्ची थी जिससे बारिश का पानी जमीन के अंदर चला जाता था लेकिन अब सड़क या मकान के रूप में जमीन का बहुत सा हिस्सा पक्का हो गया है जिससे बारिश का पानी नाली और नालों के माध्यम से बह जाता है और धरती की प्यास नहीं बुझ पाती। बारिश में भी भारी कमी आई है। करीब पांच साल पहले तक जिले में बारिश का औसत 800 से 900 एमएम था जो अब सिमटकर 250 से 300 एमएम तक हो गया है।