{"_id":"5a46854b4f1c1b4e718bbea5","slug":"15145712453-jaunpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सत्संग और साहित्य दोनों ही जीवन की आधार शिला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सत्संग और साहित्य दोनों ही जीवन की आधार शिला
Updated Fri, 29 Dec 2017 11:49 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरसठी। सावन कृपाल रूहानी मिशन निगोह प्रांगण में सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सतसंग में सावन कृपाल रुहानी मिशन के जोन कोआर्डिनेटर नरेंद्र ने भक्तों के बीच कहा कि संत महापुरुषों का सत्संग और साहित्य दोनों ही जीवन का आधारशिला है। इसमें एक भी बाहर कर दिया जाए तो जीवन का सार ही खत्म हो जाएगा।
सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरूआत गीतकार निर्मल नदीम ने एक हलचल हुई आज पाषाण में, एक झरना बहा एक नदी चल पड़ी। एक आवेग आया कि ऐसा लगा जैसे सदियों से ठहरी सदी चल पड़ी गीत गाकर किया। उसके बाद कवियों ने एक से बढ़कर एक कविता सुनाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। एकता की बात करते हुए कवि अजय शान ने कहा कि गूंजे ऋचाएं वेद की संग में अजान हो, रहमत फिजा में छाएं तो सबको गुमान हो। कवि चंद्रकांत भ्रमर ने परमेश्वर का रूप वर्णन करते हुए कहा कि तुम्ही से धरती अंबर नीर हजारों रुप तुम्हारे, देश के सीमाओं पर आए दिन हो रही विवाद पर ओज कवि संदीप बालाजी ने कहा कि, भारत मां की सीमाओं का करने जो अतिक्रमण चले है, कह दो उनके शीश आज भी पुरु प्रताप के चरण तले है। कवि योगेंद्र मौर्य ने मां के महिमा का रचना पेश करते हुए कहा मां है जीवन का विश्वास, भरे नित जीवन में उल्लास।
नरेंद्र पंकज, आलोक द्विवेदी ने कविताएं पेश की। अध्यक्षता आचार्य आलोक द्ववेदी एवं संचालन कवि नरेन्द्र पंकज ने किया। सतीश सिंह, नरेन्द्र बहादुर सिंह, पंधारी यादव, पप्पू दूबे, रामसागर आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरूआत गीतकार निर्मल नदीम ने एक हलचल हुई आज पाषाण में, एक झरना बहा एक नदी चल पड़ी। एक आवेग आया कि ऐसा लगा जैसे सदियों से ठहरी सदी चल पड़ी गीत गाकर किया। उसके बाद कवियों ने एक से बढ़कर एक कविता सुनाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। एकता की बात करते हुए कवि अजय शान ने कहा कि गूंजे ऋचाएं वेद की संग में अजान हो, रहमत फिजा में छाएं तो सबको गुमान हो। कवि चंद्रकांत भ्रमर ने परमेश्वर का रूप वर्णन करते हुए कहा कि तुम्ही से धरती अंबर नीर हजारों रुप तुम्हारे, देश के सीमाओं पर आए दिन हो रही विवाद पर ओज कवि संदीप बालाजी ने कहा कि, भारत मां की सीमाओं का करने जो अतिक्रमण चले है, कह दो उनके शीश आज भी पुरु प्रताप के चरण तले है। कवि योगेंद्र मौर्य ने मां के महिमा का रचना पेश करते हुए कहा मां है जीवन का विश्वास, भरे नित जीवन में उल्लास।
विज्ञापन
नरेंद्र पंकज, आलोक द्विवेदी ने कविताएं पेश की। अध्यक्षता आचार्य आलोक द्ववेदी एवं संचालन कवि नरेन्द्र पंकज ने किया। सतीश सिंह, नरेन्द्र बहादुर सिंह, पंधारी यादव, पप्पू दूबे, रामसागर आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन