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जो पुराणों में लिखा, वही विज्ञान : डॉ. मनोज मिश्रा
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कालपी स्थित वेदव्यास मंदिर में आईआईटी की शोधार्थियों की टीम
- फोटो : ORAI
कालपी (जालौन)। आज के तकनीकी व गैर तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में वेद पुराणों का ज्ञान कराना चाहिए, जिस से विज्ञान को पुराणों से जोड़ा जा सके। हमने महाभारत पुराण, गीता का अध्ययन करने के बाद यह पाया है कि जो पुराणों में लिखा है वही विज्ञान है। यह बात टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज अमेरिका के डा. मनोज मिश्रा ने वेदव्यास मंदिर के निरीक्षण में कही।
शनिवार को विज्ञान को पुराणों से जोड़ने के लिए आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं की टीम नगर में प्रो. देव कुमार मिश्रा के नेतृत्व में आई। फिर शोधकर्ताओं की टीम विशेषज्ञों के साथ यमुना किनारे स्थित वेदव्यास मंदिर पहुंची, जहां पर उन्होंने बड़ी गहराई से मंदिर के विषय में स्थानीय लोगों से जानकारी की और फिर भगवान वेदव्यास की मूर्ति के सामने बैठकर ध्यान भी लगाया। उसके बाद बड़ी बारीकी से मंदिर के आसपास इलाके को देखा। मुख्य शोधकर्ता डा. मनोज मिश्रा ने बताया कि सन् 1979 से 1984 तक आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने अमेरिका के विभिन्न संस्थानों में रहकर शोध किया है।
इन 40 वर्षों में जो विज्ञान में अविश्वसनीय था, उसकी पुष्टि पुराणों में हुई है। इसलिए आज के शिक्षा जगत में पुराणों का अध्ययन प्रमुख रूप से कराना चाहिए। आईआईटी के प्रो. देवी प्रसाद मिश्रा ने बताया कि प्राचीन ग्रंथों से शोध कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को उजागर करना चाहिए। प्राचीन ज्ञान को परंपरागत रूप से उसे विज्ञान व इतिहास से जोड़कर पाठ्यक्रम बनाना चाहिए, इसी सिलसिले में आईआईटी, कानपुर के शोधार्थी छात्र आनंद चटर्जी, अर्पित गहलोत और विनम्र चतुर्वेदी, शशांक साहू, भुवनदीप शर्मा व अभिषेक वर्मा मौजूद रहे।
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शनिवार को विज्ञान को पुराणों से जोड़ने के लिए आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं की टीम नगर में प्रो. देव कुमार मिश्रा के नेतृत्व में आई। फिर शोधकर्ताओं की टीम विशेषज्ञों के साथ यमुना किनारे स्थित वेदव्यास मंदिर पहुंची, जहां पर उन्होंने बड़ी गहराई से मंदिर के विषय में स्थानीय लोगों से जानकारी की और फिर भगवान वेदव्यास की मूर्ति के सामने बैठकर ध्यान भी लगाया। उसके बाद बड़ी बारीकी से मंदिर के आसपास इलाके को देखा। मुख्य शोधकर्ता डा. मनोज मिश्रा ने बताया कि सन् 1979 से 1984 तक आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने अमेरिका के विभिन्न संस्थानों में रहकर शोध किया है।
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इन 40 वर्षों में जो विज्ञान में अविश्वसनीय था, उसकी पुष्टि पुराणों में हुई है। इसलिए आज के शिक्षा जगत में पुराणों का अध्ययन प्रमुख रूप से कराना चाहिए। आईआईटी के प्रो. देवी प्रसाद मिश्रा ने बताया कि प्राचीन ग्रंथों से शोध कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को उजागर करना चाहिए। प्राचीन ज्ञान को परंपरागत रूप से उसे विज्ञान व इतिहास से जोड़कर पाठ्यक्रम बनाना चाहिए, इसी सिलसिले में आईआईटी, कानपुर के शोधार्थी छात्र आनंद चटर्जी, अर्पित गहलोत और विनम्र चतुर्वेदी, शशांक साहू, भुवनदीप शर्मा व अभिषेक वर्मा मौजूद रहे।
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