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तीन कमरों में तीन स्कूल

Tue, 29 Nov 2016 11:17 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
अमर उजाला ब्यूरो, उरई Updated Tue, 29 Nov 2016 11:17 PM IST
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three rooms, three schools
प्राथमिक विद्यालय तुफैलपुरवा विद्यालय में पंजीकृत बच्चे पढ़ाई करते हुए। - फोटो : अमर उजाला
स्थान-टाउन हाल स्थित कन्या जूनियर हाईस्कूल।
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समय-सुबह के 11 बजे।

शहर के टाउन हाल स्थित कन्या जूनियर हाईस्कूल पटेल नगर में चल रहे विद्यालय में कक्षा 6 से 8 तक की कक्षाएं संचालित हो रही हैं। विद्यालय के नाम पर सिर्फ एक ही कमरा है। तीन कक्षाओं मेें छात्र संख्या 29 है। इस एक कमरे में बच्चे बैठते हैं और यहीं विद्यालय का पूरा सामान रखा है। मिडडे मील भी यहीं बनता है। यानि एक कमरे में तीन कक्षाएं चलने के साथ

यही विद्यालय का स्टोर व रसोई भी बना हुआ है। खाना बनने के दौरान यहां उठने वाला धुआं और भाप आदि से बच्चों को काफी दिक्कत होती है। बच्चों के बैठने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। वे दरी पर बैठते हैं। ऐसे में यहां आने और पढ़ाई करने वाले बच्चों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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स्थान-टाउन हाल स्थित कन्या जूनियर हाईस्कूल।
समय-सुबह के 11.10 बजे।

इसी परिसर में प्राथमिक विद्यालय तुफैलपुरवा भी संचालित हो रहा है। यह भी सिर्फ एक कमरा और गैलरी के सहारे संचालित है। विद्यालय की पांच कक्षाएं गैलरी और इस कमरे में ही संचालित हो रही हैं। विद्यालय में छात्र-छात्राओं की कुल संख्या 45 है। वहीं इस एक कमरे के प्राइमरी विद्यालय में स्कूल का सामान, मिड-डे मील का सामान, बच्चों को बैठने की जगह,
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शिक्षिकाओं के बैठने की जगह समेत आगंतुकों आदि के बैठने की भी व्यवस्था की जाती है। यहां तीन शिक्षिकाएं भी तैनात हैं। सभी कक्षाओं के बच्चे एक साथ फटी दरी पर बैठते हैं। विद्यालय में अव्यवस्था का आलम है। ऐसे में पठन-पाठन कैसे चलता होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

सरकारें भले ही प्रदेश के विकास की बातें करती हों पर जमीनी तौर पर विकास का अहम बिंदु शिक्षा आज भी हाशिये पर है। शायद यही वजह है कि एक दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार को फटकार लगाई है और इलाहाबाद मेें स्कूलों की स्थिति को जल्द से जल्द दुरुस्त करने को कहा है। इसी बीच शहर में एक ऐसा प्रांगण है जिसमें एक नहीं बल्कि तीन-तीन

स्कूल संचालित हो रहे हैं। वह भी सिर्फ एक-एक कमरों के सहारे। अब एक कमरे में किसी स्कूल की चार-पांच कक्षाएं किस तरह चलती होंगी, किस तरह उनमें मिड डे मील बनता होगा और बच्चों को कैसे बैठाया जाता होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मामला टाउन हाल के बगल में स्थिति एक सरकारी प्रांगण का है। यहां तीन स्कूल एक-एक कमरों के

सहारे चलाए जा रहे हैं। बच्चे भी दरी और टाट पर बैठने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि सरकार द्वारा प्राइमरी, जूनियर विद्यालयों में शिक्षा सुधारने के हर संभव प्रयास की बात कही जा रही है। बच्चों को किताबें, कापी, बस्ता, मिडडे मील, छात्रवृत्ति समेत तमाम सुविधाएं देने की बात भी कही जा रही है। पर यह सुविधाएं किन परिस्थितियों में दी जा रही हैं, उसमें क्या सुधार होना चाहिए। इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। वहीं, बच्चे बिना फर्नीचर केे पुरानी टाट फट्टी पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं।


नगर क्षेत्रों में पूरे प्रदेश में स्कूलों की लगभग यही हालत है। शिक्षा विभाग की ओर से हालांकि वैकल्पिक मार्ग खोजने की कोशिश की जा रही है लेकिन जब तक शासन से बजट का आवंटन नहीं होता, स्कूलों के लिए नए भवन, फर्नीचर आदि की व्यवस्था कर पाना मुश्किल है। -प्रदीप कुमार पांडेय, बेसिक शिक्षा अधिकारी
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