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Jalaun News: नन्हे रोजेदारों का जज्बा...छोटी उम्र में बड़े हौसले
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फोटो - 04 अपनी बहन शीरीन के साथ रोजेदार शीरान। संलाद
7 से 9 साल की उम्र के बच्चे पूरे उत्साह के साथ रोजा रख रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
उरई। रमजान का पाक महीना चल रहा है और इबादत के इस मुबारक दौर में नन्हे-मुन्ने बच्चे भी पीछे नहीं हैं। 7 से 9 साल की उम्र के बच्चे पूरे उत्साह के साथ रोजा रख रहे हैं। तपती धूप और लंबे दिन के बावजूद उनके चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि रौनक और सुकून नजर आ रहा है।मोहल्लों में सुबह सहरी के वक्त बच्चों की चहल-पहल देखने लायक होती है। कोई मां के साथ उठकर सहरी करता है तो कोई अब्बू के साथ मस्जिद तक जाने की जिद करता है। शाम को इफ्तार के समय खजूर और पानी से रोजा खोलते वक्त उनके चेहरे पर खास खुशी झलकती है।
9 साल के अयान ने बताया, “मैंने इस बार तीसरा रोजा रखा है। भूख तो लगती है, लेकिन मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि सबके घरों में खुशहाली रहे और कोई बीमार न हो। 7 साल की सना ने मुस्कुराते हुए कहा, “अम्मी ने आधा रोजा रखने को कहा था, लेकिन मैंने पूरा रखा। मैं दुआ करती हूं कि सब लोग मिल-जुलकर रहें। शहर के शीरान खान और उनकी 9 वर्षीय बहन शीरीन खान भी पूरे जोश के साथ रोजा रख रहे हैं। दोनों भाई-बहन का कहना है कि रोजा रखने से उन्हें सब्र और इंसानियत का महत्व समझ में आता है। वे हर रोज नमाज के बाद अपने परिवार और देश में अमन-चैन की दुआ मांगते हैं।
बड़ों का कहना है कि बच्चों में धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ इंसानियत और सब्र का जज़्बा भी बढ़ रहा है। कम उम्र में रोजा रखकर ये बच्चे समाज को यह संदेश दे रहे हैं कि इबादत सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि नेक सोच और अच्छे किरदार का नाम है।
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7 से 9 साल की उम्र के बच्चे पूरे उत्साह के साथ रोजा रख रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
उरई। रमजान का पाक महीना चल रहा है और इबादत के इस मुबारक दौर में नन्हे-मुन्ने बच्चे भी पीछे नहीं हैं। 7 से 9 साल की उम्र के बच्चे पूरे उत्साह के साथ रोजा रख रहे हैं। तपती धूप और लंबे दिन के बावजूद उनके चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि रौनक और सुकून नजर आ रहा है।मोहल्लों में सुबह सहरी के वक्त बच्चों की चहल-पहल देखने लायक होती है। कोई मां के साथ उठकर सहरी करता है तो कोई अब्बू के साथ मस्जिद तक जाने की जिद करता है। शाम को इफ्तार के समय खजूर और पानी से रोजा खोलते वक्त उनके चेहरे पर खास खुशी झलकती है।
9 साल के अयान ने बताया, “मैंने इस बार तीसरा रोजा रखा है। भूख तो लगती है, लेकिन मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि सबके घरों में खुशहाली रहे और कोई बीमार न हो। 7 साल की सना ने मुस्कुराते हुए कहा, “अम्मी ने आधा रोजा रखने को कहा था, लेकिन मैंने पूरा रखा। मैं दुआ करती हूं कि सब लोग मिल-जुलकर रहें। शहर के शीरान खान और उनकी 9 वर्षीय बहन शीरीन खान भी पूरे जोश के साथ रोजा रख रहे हैं। दोनों भाई-बहन का कहना है कि रोजा रखने से उन्हें सब्र और इंसानियत का महत्व समझ में आता है। वे हर रोज नमाज के बाद अपने परिवार और देश में अमन-चैन की दुआ मांगते हैं।
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बड़ों का कहना है कि बच्चों में धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ इंसानियत और सब्र का जज़्बा भी बढ़ रहा है। कम उम्र में रोजा रखकर ये बच्चे समाज को यह संदेश दे रहे हैं कि इबादत सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि नेक सोच और अच्छे किरदार का नाम है।
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