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अब तक 23 मर्तबा किया रक्तदान
अमर उजाला ब्यूरो जालौन
Updated Wed, 21 Oct 2015 12:43 AM IST
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साधारण परिवार मेें जन्मी डॉ. ममता स्वर्णकार ने यह साबित कर दिखाया कि उड़ने के लिए पंख नहीं हौसला होना चाहिए। समाज सेवा का उनमें ऐसा जज्बा जागा कि जरूरतमंद की मदद के लिए अब तक 23 बार रक्तदान कर चुकी हैं। साथ ही महिलाओं को समाजसेवा के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित भी करती हैं।
बकौल ममता उनकी मां शकुंतला स्वर्णकार सिलाई का काम और पिता मिश्रीलाल स्वर्णकार एक दुकान पर काम करते हैं। इस गाढ़ी कमाई से चार बहनों व तीन भाइयों की पढ़ाई लिखाई का खर्चा चलाते थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किन परिस्थितियों में पली बढ़ी, पर इन संघर्षों ने ही उन्हें साहसी बनाया।
जब वह दसवीं कक्षा में थी तो उस समय मां के सिलाई के काम में हाथ बटाने के अलावा छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्चा खुद निकालने लगी। छोटे भाई बहनों को भी पढ़ाने लगी। इससे माता-पिता का कुछ बोझ हल्का हुआ। इसके बाद बीए पास करने के बाद प्राइवेट नौकरी करने लगी।
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अपनी पढ़ाई अनवरत रखी। ममता बताती हैं कि इसके बाद वर्ष 2004 में प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर चयन हो गया। सरकारी नौकरी मिलते ही घर में खुशी छा गई। उसी दौरान घरवाले शादी के लिए जोर देने लगे, लेकिन उन्होंने शादी करने से मना कर दिया।
प्रतिज्ञा की कि इस नौकरी के रुपयों से अपने भाई-बहन को पढ़ाने के साथ किराए पर रह रहे माता-पिता के लिए एक घर बनवाएंगी। सामाजिक कार्यों में अपना अहम योगदान देंगे। बस फिर क्या था, 23 बार रक्तदान किया, इसके बाद एक अक्तूबर 2014 को देहदान करने का संकल्प किया।
इस कार्य से जिले की सबसे कम उम्र में महिला बाडी डोनट बनी। इसके अलावा बचपन से ही खेलकूद में रुचि होने से कई बार 200, 400, 800 मीटर रेस में चैंपियनशिप हासिल की। कबड्डी व बालीवाल राज्य स्तर तक खेली। इससे जिला गाइड कैप्टन जालौन, जिला ट्रेनिंग कमिश्नर गाइड, जिला व्यायाम शिक्षिका जालौन व राज्य स्तर जिला संदर्भ दाता बनाया गया।
इसके अलावा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा, महिला शिक्षा व सुरक्षा सम्मान से सीएम अखिलेश यादव ने भी सम्मानित किया।
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बकौल ममता उनकी मां शकुंतला स्वर्णकार सिलाई का काम और पिता मिश्रीलाल स्वर्णकार एक दुकान पर काम करते हैं। इस गाढ़ी कमाई से चार बहनों व तीन भाइयों की पढ़ाई लिखाई का खर्चा चलाते थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किन परिस्थितियों में पली बढ़ी, पर इन संघर्षों ने ही उन्हें साहसी बनाया।
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जब वह दसवीं कक्षा में थी तो उस समय मां के सिलाई के काम में हाथ बटाने के अलावा छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्चा खुद निकालने लगी। छोटे भाई बहनों को भी पढ़ाने लगी। इससे माता-पिता का कुछ बोझ हल्का हुआ। इसके बाद बीए पास करने के बाद प्राइवेट नौकरी करने लगी।
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अपनी पढ़ाई अनवरत रखी। ममता बताती हैं कि इसके बाद वर्ष 2004 में प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर चयन हो गया। सरकारी नौकरी मिलते ही घर में खुशी छा गई। उसी दौरान घरवाले शादी के लिए जोर देने लगे, लेकिन उन्होंने शादी करने से मना कर दिया।
प्रतिज्ञा की कि इस नौकरी के रुपयों से अपने भाई-बहन को पढ़ाने के साथ किराए पर रह रहे माता-पिता के लिए एक घर बनवाएंगी। सामाजिक कार्यों में अपना अहम योगदान देंगे। बस फिर क्या था, 23 बार रक्तदान किया, इसके बाद एक अक्तूबर 2014 को देहदान करने का संकल्प किया।
इस कार्य से जिले की सबसे कम उम्र में महिला बाडी डोनट बनी। इसके अलावा बचपन से ही खेलकूद में रुचि होने से कई बार 200, 400, 800 मीटर रेस में चैंपियनशिप हासिल की। कबड्डी व बालीवाल राज्य स्तर तक खेली। इससे जिला गाइड कैप्टन जालौन, जिला ट्रेनिंग कमिश्नर गाइड, जिला व्यायाम शिक्षिका जालौन व राज्य स्तर जिला संदर्भ दाता बनाया गया।
इसके अलावा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा, महिला शिक्षा व सुरक्षा सम्मान से सीएम अखिलेश यादव ने भी सम्मानित किया।