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विपत्ति में जो साथ से वही सच्चा मित्र
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गोरा करनपुर में भागवत कथा कहते पं. सागरकृष्ण शास्त्री
- फोटो : ORAI
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कोंच। गोरा करनपुर गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन की कथा सुनाते हुए सागर कृष्ण शास्त्री ने बताया कि सांसारिक प्रपंचों में फंसे जीव को युवावस्था में ही अपनी गति सुधार लेनी चाहिए, अन्यथा की स्थिति में न सिर्फ इहलोक बल्कि परलोक की गति भी नष्ट हो जाएगी।
वह कहते हैं, कथाएं जीवन के प्रत्येक मोड़ को संभालकर जीव को कल्याण का रास्ता दिखाती हैं। इसलिए व्यक्तिगत सामाजिक व पारिवारिक जीवन में मर्यादित आचरण का धर्म पूर्वक पालन किया जाए तो जीवन की उन्नति और कल्याण होगा। धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी के माध्यम से कथा व्यास ने कहा कि दुख में तन मन धन से जो साथ निभाए वही सच्चा मित्र होता है। मित्रता में स्वार्थ नहीं होना चाहिए, जहां भी स्वार्थ की भावना होगी वहां सही मायने में मित्रता नहीं हो नहीं सकती।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा ब्राह्मण सुबह से शाम तक भजन पूजन कर भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। उनके घर में ि विपन्नता की स्थिति यह थी कि कई दिन तक भोजन नहीं मिलता था। उनकी पत्नी सुशीला ने सुदामा से अपने बचपन के मित्र श्रीकृष्ण के पास जाने को कहा औेर अपने पड़ोसियों से मांगकर लाए गए चार मुट्ठी तंदुल दे करके सुदामा जी को विदा किया। सुदामा अपने मित्र के यहां पहुंचे, भगवान श्रीकृष्ण ने गले से लगाकर उन्हें पूरा सम्मान दिया और बिना मांगे ही उन्हें दो लोकों का ऐश्वर्य प्रदान किया। उनकी मित्रता को लोग आज भी याद करते हैं।
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वह कहते हैं, कथाएं जीवन के प्रत्येक मोड़ को संभालकर जीव को कल्याण का रास्ता दिखाती हैं। इसलिए व्यक्तिगत सामाजिक व पारिवारिक जीवन में मर्यादित आचरण का धर्म पूर्वक पालन किया जाए तो जीवन की उन्नति और कल्याण होगा। धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी के माध्यम से कथा व्यास ने कहा कि दुख में तन मन धन से जो साथ निभाए वही सच्चा मित्र होता है। मित्रता में स्वार्थ नहीं होना चाहिए, जहां भी स्वार्थ की भावना होगी वहां सही मायने में मित्रता नहीं हो नहीं सकती।
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उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा ब्राह्मण सुबह से शाम तक भजन पूजन कर भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। उनके घर में ि विपन्नता की स्थिति यह थी कि कई दिन तक भोजन नहीं मिलता था। उनकी पत्नी सुशीला ने सुदामा से अपने बचपन के मित्र श्रीकृष्ण के पास जाने को कहा औेर अपने पड़ोसियों से मांगकर लाए गए चार मुट्ठी तंदुल दे करके सुदामा जी को विदा किया। सुदामा अपने मित्र के यहां पहुंचे, भगवान श्रीकृष्ण ने गले से लगाकर उन्हें पूरा सम्मान दिया और बिना मांगे ही उन्हें दो लोकों का ऐश्वर्य प्रदान किया। उनकी मित्रता को लोग आज भी याद करते हैं।

-भागवत कथा सुनते श्रोतागण- फोटो : ORAI
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