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कोविड की छाया में मनाया जा रहा है रामलला मंदिर का झूला महोत्सव
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कोंच (जालौन)। रामलला मंदिर के झूला महोत्सव पर कोविड की छाया दिखाई दे रही है। पहले जहां संगीत मर्मज्ञों का जमघट लगता था वहीं कोरोना के कारण इक्का दुक्का संगीत के जानकर ही पहुंच रहे हैं। भादौं माह की कृष्ण प्रतिपदा में झूला महोत्सव का अवसान होगा।
प्रथम दिवस महंत रघुनाथ दास के सानिध्य में ग्यासीलाल, पुजारी गोविंददास, शिवशंकर त्रिपाठी, सुनील पाठक, सृष्टि वर्मा आदि ने झूला गीत और पक्के राग सुनाकर भगवान रामलला को प्रसन्न किया। संचालन रामकृष्ण परिहार ने किया। यहां का प्रसिद्ध प्राचीन रामलला मंदिर जहां वीरांगना लक्ष्मीबाई के गुरुद्वारे के रूप में सुविख्यात है तो वहीं अपने अनूठे झूला महोत्सव को लेकर भी इसकी अपनी एक अलग पहचान है।
श्रावण शुक्ल तृतीया से प्रारंभ होकर भाद्र कृष्ण प्रतिपदा तक चलने वाले इस झूला महोत्सव में शास्त्रीय और सुगम संगीत के मर्मज्ञ अपनी गायन कला का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन करते हैं कि लोग लंबे समय तक उन्हें भुला नहीं पाते हैं। जानकारों की अगर मानें तो इस परंपरा को प्रारंभ हुए कमोवेश शताब्दी भर से भी अधिक समय हो गया होगा और बिना नागा यह परंपरा अभी भी अनवरत जारी है।
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पखवाड़े भर चलने वाले इस झूला महोत्सव में बाहर से आने वाले संगीत मर्मज्ञों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था मंदिर के जिम्मे ही है। कस्बे में भी बहुत से ऐसे युवा और बालक बालिकाएं हैं जिन्हें शास्त्रीय संगीत में रुचि है और इस तरह के कार्यक्रम निश्चित रूप से उनका मनोबल बढ़ाने में अपनी महती भूमिका निभाते हैं।
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प्रथम दिवस महंत रघुनाथ दास के सानिध्य में ग्यासीलाल, पुजारी गोविंददास, शिवशंकर त्रिपाठी, सुनील पाठक, सृष्टि वर्मा आदि ने झूला गीत और पक्के राग सुनाकर भगवान रामलला को प्रसन्न किया। संचालन रामकृष्ण परिहार ने किया। यहां का प्रसिद्ध प्राचीन रामलला मंदिर जहां वीरांगना लक्ष्मीबाई के गुरुद्वारे के रूप में सुविख्यात है तो वहीं अपने अनूठे झूला महोत्सव को लेकर भी इसकी अपनी एक अलग पहचान है।
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श्रावण शुक्ल तृतीया से प्रारंभ होकर भाद्र कृष्ण प्रतिपदा तक चलने वाले इस झूला महोत्सव में शास्त्रीय और सुगम संगीत के मर्मज्ञ अपनी गायन कला का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन करते हैं कि लोग लंबे समय तक उन्हें भुला नहीं पाते हैं। जानकारों की अगर मानें तो इस परंपरा को प्रारंभ हुए कमोवेश शताब्दी भर से भी अधिक समय हो गया होगा और बिना नागा यह परंपरा अभी भी अनवरत जारी है।
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पखवाड़े भर चलने वाले इस झूला महोत्सव में बाहर से आने वाले संगीत मर्मज्ञों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था मंदिर के जिम्मे ही है। कस्बे में भी बहुत से ऐसे युवा और बालक बालिकाएं हैं जिन्हें शास्त्रीय संगीत में रुचि है और इस तरह के कार्यक्रम निश्चित रूप से उनका मनोबल बढ़ाने में अपनी महती भूमिका निभाते हैं।