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भक्तों के स्मरण करने पर दौड़े चले आते हैं भगवान
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ब्राह्मण महासभा परिसर में भागवत कथा कहते पं. ब्रजमोहन तिवारी
- फोटो : ORAI
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कोंच। ब्राह्मण महासभा के तत्वाधान में गोखलेनगर में जारी श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कथा व्यास ब्रजमोहन तिवारी ने कहा कि भक्त और भगवान के बीच जो भावनात्मक संबंध होतेे हैं, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। भक्तों के कष्ट दूर करने के लिए उनकी एक ही पुकार पर भगवान दौड़े चले आते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब भक्त निश्छल और कपटरहित हृदय से उनका स्मरण करता है।
महासभा अध्यक्ष देवीदयाल रावत और महामंत्री अनुरुद्घ मिश्रा की देखरेख में संयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह में भगवान की मनोहारी लीलाओं का वर्णन सुन श्रोता भावविभोर हो गए। उन्होंने कहा कि गो, ब्राह्मण, संत और सत्संगी जीवों पर जब भी विपत्ति आती है और वे निर्मल मन से जब भगवान का स्मरण करते हैं तब परमात्मा किसी न किसी रूप में इस धरा पर आकर भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं।
कथा व्यास बताते हैं कि परमात्मा का वास सब जगह है, बस जरूरत है उसे पहचानने की, जो भी उसे सच्चे मन से स्मरण करता है वह अवश्य ही उसे प्राप्त होता है। उन्होंने भगवन्नाम स्मरण का महात्म्य बताते हुए अजामिल की कथा सुनाई, बताया कि दुष्टात्मा अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रख लिया और अपने अंत समय में जब उसने नारायण को पुकारा तो भगवान स्वयं वहां पधारे और उसकी ज्योति को अपने में विलीन कर उसे मुक्ति प्रदान की। अंत में परीक्षित मिथलेश अवस्थी ने भागवतजी की आरती उतारी और प्रसाद वितरित किया गया।
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महासभा अध्यक्ष देवीदयाल रावत और महामंत्री अनुरुद्घ मिश्रा की देखरेख में संयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह में भगवान की मनोहारी लीलाओं का वर्णन सुन श्रोता भावविभोर हो गए। उन्होंने कहा कि गो, ब्राह्मण, संत और सत्संगी जीवों पर जब भी विपत्ति आती है और वे निर्मल मन से जब भगवान का स्मरण करते हैं तब परमात्मा किसी न किसी रूप में इस धरा पर आकर भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं।
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कथा व्यास बताते हैं कि परमात्मा का वास सब जगह है, बस जरूरत है उसे पहचानने की, जो भी उसे सच्चे मन से स्मरण करता है वह अवश्य ही उसे प्राप्त होता है। उन्होंने भगवन्नाम स्मरण का महात्म्य बताते हुए अजामिल की कथा सुनाई, बताया कि दुष्टात्मा अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रख लिया और अपने अंत समय में जब उसने नारायण को पुकारा तो भगवान स्वयं वहां पधारे और उसकी ज्योति को अपने में विलीन कर उसे मुक्ति प्रदान की। अंत में परीक्षित मिथलेश अवस्थी ने भागवतजी की आरती उतारी और प्रसाद वितरित किया गया।
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