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Jalaun News: तीमारदार ड्रिप हाथ में थाम अपनों का करा रहे इलाज

Mon, 05 May 2025 12:36 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन
संवाद न्यूज एजेंसी, जालौन Updated Mon, 05 May 2025 12:36 AM IST
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Caretakers are getting their loved ones treated with drip in their hands
उरई। मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की हकीकत जाननी हो तो रात होने का इंतजार करिए और खुद को एक ग्रामीण मरीज की तरह पेश करिए। तब देखिए कि मेडिकल कॉलेज का स्टाफ मरीज को किस तरह से देखता है। मरीज को ड्रिप की बोतल लगाकर तीमारदार के हाथ में ही थमा दी जाती है। न तो बेड की व्यवस्था होती है और न ही कोई स्टाफ मौके पर जाकर देखने आता है, जब तक तीमारदार मिन्नतें न करने लगें। शुक्रवार की रात अमर उजाला की टीम ने मेडिकल कॉलेज की व्यवस्थाओं की सच्चाई जानी और देखा कि स्टाफ का व्यवहार मरीजों के प्रति कैसा रहता है। अगर इमरजेंसी में मरीज आता है, तो उसे कितनी देर में इलाज मिलता है। व्यवस्थाएं बदहाल मिलीं और तीमारदार भी इससे परेशान नजर आए। राजकीय मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अरविंद त्रिवेदी ने कहा कि बेडों की पर्याप्त व्यवस्था है। अगर ऐसा है तो वह पर तैनात स्टाफ से सुधार के लिए कहा जाएगा। रात के समय भी व्यवस्थाएं देखी जाएंगी।
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सीन-1 समय: 10:30 रात
एक मरीज मिला, पर वह बेड पर नहीं बल्कि बैठने वाली सीट पर लेटा था। उसका बेटा ड्रिप की बोतल पकड़े हुए था। मरीज ने बताया कि आधा घंटे बाद इलाज मिला। कोई बेड खाली नहीं था। दर्द बहुत था, तो ऐसे ही बोतल लगा दी गई और कह दिया गया कि हाथ से पकड़ लो, यहीं चढ़ जाएगी। इसलिए लड़के को पकड़वा दी। नाम पूछने पर मरीज ने कहा कि जो इलाज दे रहा है, वह भी नहीं देगा अगर नाम बताऊंगा। आप सिर्फ फोटो ले लो, सब कुछ सामने दिख जाएगा।
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सीन-2 समय: 10:35
राठ निवासी भानवती इलाज करवाने के लिए पहुंचीं। बताया कि जैसे-तैसे एक घंटे बाद इलाज मिला। ड्रिप लगाकर कोई कर्मचारी देखने तक नहीं आया कि बोतल खाली हुई या नहीं। 15 मिनट से ज्यादा समय हो गया है, बोतल खाली हो चुकी है, कोई बदलने तक नहीं आ रहा। उनका कहना था कि वह दूसरे जिले से आई हैं। इलाज मिल गया, यही बहुत है। व्यवस्थाएं बेहद खराब हैं। स्टाफ का व्यवहार भी अच्छा नहीं है। इसलिए किसी से कुछ नहीं कह रहे हैं। रात के समय किसी और अस्पताल में नहीं जा सकते, इतने पैसे नहीं हैं।
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सीन-3 समय:10:40
इंदिरानगर निवासी जितेंद्र ठाकुर ने बताया कि वह अपनी बच्ची को दिखाने आए हैं। आधे घंटे बाद पर्चा बना और ड्रिप की बोतल लगाई गई। बच्ची को पेट में दर्द और कमजोरी थी। यह स्थिति कोई नई नहीं है। रात के समय इलाज मिलना मुश्किल हो जाता है। किसी से भी कह दो पर कुछ नहीं होता। आप फोटो खबर छाप भी दो, तब भी यहां कुछ नहीं बदलेगा। आरोप लगाया कि ज्यादा कहने पर स्टाफ अभद्रता लगता है।




सीन-4 समय:10:50
मेडिकल कॉलेज के बच्चा वार्ड में टीम करीब 10:50 बजे पहुंची तो किसी भी बेड पर चादर नहीं थी। मरीज और तीमारदार बिना चादर के लेटे हुए थे। कई बेड फटे मिले। कुछ तीमारदार घर से लाकर चादरें बिछाए थे। जब एक नर्स से पूछा तो उसने बताया कि चादरें गंदी हो गई थीं, इसलिए हटा दी गई हैं। कल नई चादरें आएंगी। जबकि हर साल लाखों रुपयें चादरों की धुलाई और खरीदी में खर्च किए जाते हैं। हकीकत यह है कि दर्जनों बेड बिना चादर के थे और चार-पांच बेड फटे हुए थे। इन व्यवस्थाओं को सुधारने के बजाय उन्हें छिपाया जा रहा है।
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