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नवजात को एचआईवी संक्रमित होने से बचाने की मुहिम
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ममता संस्था के कार्यक्रम अधिकारी पुरुषोत्तम तिवारी
- फोटो : ORAI
उरई। एड्स का नाम सुनते ही लोग घबरा जाते है और एड्स पीड़ित को देखकर भयभीत हो जाते है। जबकि सावधानी बरती जाए तो बीमारी फैलने से रोकी जा सकती है। जरूरत, समय पर बीमारी के पता चलने की होती है। कुछ ऐसा ही काम बुंदेलखंड में करके भी दिखा रही है सामाजिक संस्था ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट फार मदर एंड चाइल्ड (एचआईएमसी)।
संस्था से जुड़े लोगों के मुताबिक, जनपद जालौन में अभी तक 37 नवजात बच्चों को उनकी मां से मिली एड्स की बीमारी से बचाया जा चुका है। ममता संस्था के जालौन एवं महोबा जनपद के कार्यक्रम अधिकारी पुरुषोत्तम तिवारी ने बताया कि उनके दोनों जिलों में 40 एड्स पीड़ित महिलाओं के नवजात बच्चों को बीमारी से बचाया गया। अब इन महिलाओं के सभी नवजात बीमारी कोसों दूर है। इनमें जालौन की 37 और महोबा की तीन गर्भवती महिलाएं शामिल थी। जिनके नवजात बच्चों को जानलेवा बीमारी स बचाया जा सका है। संस्था उनके केयर सपोर्ट एंड ट्रीटमेंट (उपचार, देखभाल और सलाह) का काम करती हैं।
ऐसे मिलते हैं मरीज, फिर होता इलाज
संस्था के अधिकारियों का कहना है कि उनकी टीमें जिले के महिला अस्पताल के अलावा अन्य अस्पतालों में जाकर गर्भवती महिलाओं की जांच रिपोर्ट का पता करती है। यदि किसी महिला में एचआईवी संक्रमण मिलता है तो उस पर तत्काल ही इलाज शुरू कर दिया जाता है। सबसे पहले प्रसूता को एआरटी दवा (एंटी रेक्ट्रोवायरल थैरेपी) दी जाती है। फिर नवजात का जन्म होते ही उसे नेव्रापिन सीरप पिलाते है। फिर साठ दिन अंदर नवजात की पहली बार एचआईवी जांच कराते हैं। फिर डाक्टर की सलाह के बाद नेव्रापिन के स्थान पर सीपीटी देना शुरू कर देते है। 18वें महीने में एचआईवी की अंतिम जांच कराकर एचआईवी होने या न होने की पुष्टि की जाती है। उन्होंने बताया कि संस्था की नियमित देखभाल का असर यह हुआ है कि कुल 38 नवजात में से सिर्फ एक बच्चे को ही एचआईवी संक्रमण हुआ है। वह भी समय से उसका इलाज न होने के कारण उसे एचआईवी संक्रमित होने से नहीं बचाया जा सका।
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एहतियात बरतें तो बच्चे को संक्रमण से बचा सकते हैं
कदौरा की एक एचआईवी पॉजीटिव महिला का कहना है कि एचआईवी पॉजीटिव होने के बावजूद उसने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। इसे लेकर समाज को धारणा बदलने की जरूरत है। यदि मां एचआईवी पीड़ित है और ऐहतियात बरती जाए तो यह फैलने को रोका जा सकता है। पीड़ितों के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
शुरुआत में ही जांच से रोका जा सकता है एड्स
नोडल अधिकारी एवं जिला क्षय रोग अधिकारी डा. सुग्रीव बाबू कहते हैं सबसे बड़ी सावधानी है कि शुरुआत में ही जांच करा ली जाए। स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रत्येक गर्भवती की एचआईवी जांच का प्रोग्राम भी चल रहा है। प्रसव के दौरान एचआईवी पीड़ित महिला का विशेष ध्यान रखा जाता है। जिले के सभी सब सेंटर पर एएनएम के एचआईवी की किट उपलब्ध है। एचआईवी से बचाव के लिए कई संस्थाएं काम कर रही है।
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संस्था से जुड़े लोगों के मुताबिक, जनपद जालौन में अभी तक 37 नवजात बच्चों को उनकी मां से मिली एड्स की बीमारी से बचाया जा चुका है। ममता संस्था के जालौन एवं महोबा जनपद के कार्यक्रम अधिकारी पुरुषोत्तम तिवारी ने बताया कि उनके दोनों जिलों में 40 एड्स पीड़ित महिलाओं के नवजात बच्चों को बीमारी से बचाया गया। अब इन महिलाओं के सभी नवजात बीमारी कोसों दूर है। इनमें जालौन की 37 और महोबा की तीन गर्भवती महिलाएं शामिल थी। जिनके नवजात बच्चों को जानलेवा बीमारी स बचाया जा सका है। संस्था उनके केयर सपोर्ट एंड ट्रीटमेंट (उपचार, देखभाल और सलाह) का काम करती हैं।
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ऐसे मिलते हैं मरीज, फिर होता इलाज
संस्था के अधिकारियों का कहना है कि उनकी टीमें जिले के महिला अस्पताल के अलावा अन्य अस्पतालों में जाकर गर्भवती महिलाओं की जांच रिपोर्ट का पता करती है। यदि किसी महिला में एचआईवी संक्रमण मिलता है तो उस पर तत्काल ही इलाज शुरू कर दिया जाता है। सबसे पहले प्रसूता को एआरटी दवा (एंटी रेक्ट्रोवायरल थैरेपी) दी जाती है। फिर नवजात का जन्म होते ही उसे नेव्रापिन सीरप पिलाते है। फिर साठ दिन अंदर नवजात की पहली बार एचआईवी जांच कराते हैं। फिर डाक्टर की सलाह के बाद नेव्रापिन के स्थान पर सीपीटी देना शुरू कर देते है। 18वें महीने में एचआईवी की अंतिम जांच कराकर एचआईवी होने या न होने की पुष्टि की जाती है। उन्होंने बताया कि संस्था की नियमित देखभाल का असर यह हुआ है कि कुल 38 नवजात में से सिर्फ एक बच्चे को ही एचआईवी संक्रमण हुआ है। वह भी समय से उसका इलाज न होने के कारण उसे एचआईवी संक्रमित होने से नहीं बचाया जा सका।
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एहतियात बरतें तो बच्चे को संक्रमण से बचा सकते हैं
कदौरा की एक एचआईवी पॉजीटिव महिला का कहना है कि एचआईवी पॉजीटिव होने के बावजूद उसने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। इसे लेकर समाज को धारणा बदलने की जरूरत है। यदि मां एचआईवी पीड़ित है और ऐहतियात बरती जाए तो यह फैलने को रोका जा सकता है। पीड़ितों के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
शुरुआत में ही जांच से रोका जा सकता है एड्स
नोडल अधिकारी एवं जिला क्षय रोग अधिकारी डा. सुग्रीव बाबू कहते हैं सबसे बड़ी सावधानी है कि शुरुआत में ही जांच करा ली जाए। स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रत्येक गर्भवती की एचआईवी जांच का प्रोग्राम भी चल रहा है। प्रसव के दौरान एचआईवी पीड़ित महिला का विशेष ध्यान रखा जाता है। जिले के सभी सब सेंटर पर एएनएम के एचआईवी की किट उपलब्ध है। एचआईवी से बचाव के लिए कई संस्थाएं काम कर रही है।

जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ सुग्रीव बाबू- फोटो : ORAI