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हैंडपंपों की लड़ाई लड़कर जल सहेली बनीं किरन
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रामपुरा। रामपुरा के बीहड़ स्थित टीहर गांव की किरन देवी के बारे में किसी ने सोचा भी न था कि एक दिन वो अपने हौसले और आत्मविश्वास के कारण पूरे गांव भर में जल सहेली के नाम से पुकारी जाएंगी। एक निरक्षर महिला होकर भी किरन न सिर्फ अपने गांव बल्कि आसपास के कुछ अन्य गांवों में भी जल संरक्षण और स्वच्छता अभियान पर जागरुकता की मुहिम चला रही है।
यह मुहिम सिर्फ जुबानी ही नहीं है, इसमें किरन का संघर्ष और उनका पसीना भी शामिल है। यही वजह है कि आज गांव में कहीं भी कोई हैंडपंप खराब होता है तो ग्रामीण अधिकारी के पास बाद में जाते हैं लेकिन पहले जल सहेली यानि किरन का दरवाजा खटखटाते हैं। इसके बाद अनपढ़ किरन प्रार्थना पत्र लेकर निकल पड़ती है और फिर हैंडपंप बनवाने के बाद ही दम लेती है।
गांव के एक मजदूर मानसिंह की 40 वर्षीय पत्नी किरन का घर किसी सरकारी दफ्तर से कम नहीं है। सुबह होते ही लोग समस्या लेकर जल सहेली के पास पहुंच जाते हैं। समस्या यदि किरन के बस की हुई तो वे घर का काम काज निपटाकर फौरन ही प्रार्थी को लेकर तहसील कूच भी कर देती है। किरन ने बताया कि 2011 में जब उनके घर के पास कोई हैंडपंप नहीं था, तो उन्हें पानी लेने के लिए काफी दूर जाना पड़ता था।
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तपती दोपहर में पानी लाने की कठिनाई ने उन्हें हौसला दिया और फिर उन्होंने विकास खंड दफ्तर से लेकर तहसील कार्यालय तक दौड़ लगाई और आखिर में महीने डेढ़ महीने के बाद हैंडपंप स्वीकृत करा लिया। इसके बाद उन्हें हैंडपंप लगवाने का तरीका भी पता चल गया। इस बीच एक एनजीओ ने भी उनका साथ दिया था। फिर क्या था, कहीं भी हैंडपंप संबंधी कोई समस्या आती तो लोग उनके पास ही आने लगे।
किरन के मुताबिक अब तक वे करीब गांव भर में लगभग 13 नए हैंडपंप लगवा चुकी है और करीब 25-26 से अधिक हैंडपंप रीबोर भी करा चुकी हैं। इसके बाद गांव की 12-13 महिलाएं भी उनके साथ जुड़ गई और उन्होंने ग्रामीणों को जल संरक्षण के लिए जागरूक करना शुरू कर दिया। वे ग्रामीणों को बारिश का पानी भी बचाने के लिए प्रेरित करती है।
छतों पर भरने वाले पानी को नाली के माध्यम से आसपास के खेतों तक पहुंचाने का भी काम उन्होंने कराया। इसके अलावा इसके अलावा वे करीब 200 लोगों को शौचालय बनवाने के लिए भी प्रेरित कर चुकी है। शौचालय बनने के बाद वे उस पर इज्जतघर भी लिखवाती है। विकास खंड और तहसील दफ्तर के बाबू से लेकर अधिकारी तक सभी जल सहेली को अब अच्छी तरह से पहचानने भी लगे हैं।
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यह मुहिम सिर्फ जुबानी ही नहीं है, इसमें किरन का संघर्ष और उनका पसीना भी शामिल है। यही वजह है कि आज गांव में कहीं भी कोई हैंडपंप खराब होता है तो ग्रामीण अधिकारी के पास बाद में जाते हैं लेकिन पहले जल सहेली यानि किरन का दरवाजा खटखटाते हैं। इसके बाद अनपढ़ किरन प्रार्थना पत्र लेकर निकल पड़ती है और फिर हैंडपंप बनवाने के बाद ही दम लेती है।
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गांव के एक मजदूर मानसिंह की 40 वर्षीय पत्नी किरन का घर किसी सरकारी दफ्तर से कम नहीं है। सुबह होते ही लोग समस्या लेकर जल सहेली के पास पहुंच जाते हैं। समस्या यदि किरन के बस की हुई तो वे घर का काम काज निपटाकर फौरन ही प्रार्थी को लेकर तहसील कूच भी कर देती है। किरन ने बताया कि 2011 में जब उनके घर के पास कोई हैंडपंप नहीं था, तो उन्हें पानी लेने के लिए काफी दूर जाना पड़ता था।
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तपती दोपहर में पानी लाने की कठिनाई ने उन्हें हौसला दिया और फिर उन्होंने विकास खंड दफ्तर से लेकर तहसील कार्यालय तक दौड़ लगाई और आखिर में महीने डेढ़ महीने के बाद हैंडपंप स्वीकृत करा लिया। इसके बाद उन्हें हैंडपंप लगवाने का तरीका भी पता चल गया। इस बीच एक एनजीओ ने भी उनका साथ दिया था। फिर क्या था, कहीं भी हैंडपंप संबंधी कोई समस्या आती तो लोग उनके पास ही आने लगे।
किरन के मुताबिक अब तक वे करीब गांव भर में लगभग 13 नए हैंडपंप लगवा चुकी है और करीब 25-26 से अधिक हैंडपंप रीबोर भी करा चुकी हैं। इसके बाद गांव की 12-13 महिलाएं भी उनके साथ जुड़ गई और उन्होंने ग्रामीणों को जल संरक्षण के लिए जागरूक करना शुरू कर दिया। वे ग्रामीणों को बारिश का पानी भी बचाने के लिए प्रेरित करती है।
छतों पर भरने वाले पानी को नाली के माध्यम से आसपास के खेतों तक पहुंचाने का भी काम उन्होंने कराया। इसके अलावा इसके अलावा वे करीब 200 लोगों को शौचालय बनवाने के लिए भी प्रेरित कर चुकी है। शौचालय बनने के बाद वे उस पर इज्जतघर भी लिखवाती है। विकास खंड और तहसील दफ्तर के बाबू से लेकर अधिकारी तक सभी जल सहेली को अब अच्छी तरह से पहचानने भी लगे हैं।