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सियासत की बिसात पर बदली मोहरों की चाल
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उरई। कहते हैं कि सियासत की बिसात पर दोस्त और विरोधी स्थायी नहीं होते है, कब कौन किस मोड़ पर कैसे सामने आ जाए कोई नही जानता। कुछ ऐसा ही उलटफेर जालौन भोगनीपुर गरौठा संसदीय सीट पर हुआ है। जहां पैराशूट लेकर भाजपा में उतरे सपा के पूर्व सांसद घनश्याम अनुरागी ने चुनावी समीकरणों में उथल पुथल मचा दी है।
सपा से राजनीति शुरू करने वाले अनुरागी का अब तक भाजपा के ही प्रत्याशी भानु से तीन बार चुनाव में आमना-सामना हुआ है, जिसमें एक बार अनुरागी और दो बार भानु विजय रहे हैं। 2019 में तस्वीर ऐसी बदली की अनुरागी अचानक हाथी से उतरकर अब कमल खिलाने को तैयार हैं। मतलब साफ है, कल तक जो खुद एक-दूसरे के खिलाफ लड़ा करते थे, अब मिलकर जीतने के लिए मैदान में नजर आ रहे हैं या फिर यूं कहें कि जिन भानु की जीत अनुरागी के लिए किसी किरकिरी से कम नहीं थी, आज अनुरागी उन्हीं को जिताने की अपील करते नजर आएंगे। भानु और अनुरागी के बीच लड़ाई का सिलसिला करीब 15 साल पुराना है।
जब पहली बार 2004 के लोकसभा चुनाव में दोनों एक-दूसरे के सामने आए। उस वक्त भानु दो बार सांसद रहकर एक मंझे हुए खिलाड़ी के रूप में मैदान में थे, जबकि अनुरागी का पहला ही लोकसभा चुनाव था, लिहाज परिणाम भी ऐसा ही रहा। भानु को 2004 के चुनाव में 1,95,228 मत मिले और अनुरागी को 1,68,437 ही मत मिले और भानु विजय घोषित किए गए। इसके बाद फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में भानु और अनुरागी आमने-सामने खड़े नजर आए। इस बार सूबे में बसपा की सरकार थी और जिला जालौन भी बसपा का गढ़ माना जाता था। ऐसी कठिन परिस्थितियों में अनुरागी ने संसदीय सीट पर भानु को ही हराकर पहेली बार साइकिल को जीत दिलाई और सांसद बने।
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2009 में अनुरागी को 2,83,023 मत और भाजपा के भानु को कुल 1,31,259 मतों पर ही संतोष करना पड़ा था। दोनों के बीच अभी तक का तीसरा और आखिरी मुकाबला मोदी लहर में 2014 में हुआ। जब भानु को 5 लाख से अधिक वोट मिले और अनुरागी को लगभग 2 लाख वोट पाकर तीसरे स्थान पर जाना पड़ा। 2015 तक अनुरागी साइकिल पर ही सवार रहे लेकिन 2016 में सपा ने अनुरागी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया तो 2019 में टिकट के लिए ही अनुरागी ने हाथी की सवारी यानी बसपा में जाने का फैसला किया। तब सभी को लग रहा था कि अनुरागी और भानु के बीच चौथा और रोमांचकारी मुकाबला 2019 में फिर देखने को मिलेगा लेकिन किसी को क्या पता था कि वक्त का पहिया ऐसा घूमेगा कि दोनों धुर विरोधी इस चुनाव में कंधे से कंधा मिलाए नजर आएंगे। हालांकि अनुरागी के भाजपा में शामिल होने के बाद से अभी तक जनपद के भाजपाई चुप्पी ही साधे हुए हैं।
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सपा से राजनीति शुरू करने वाले अनुरागी का अब तक भाजपा के ही प्रत्याशी भानु से तीन बार चुनाव में आमना-सामना हुआ है, जिसमें एक बार अनुरागी और दो बार भानु विजय रहे हैं। 2019 में तस्वीर ऐसी बदली की अनुरागी अचानक हाथी से उतरकर अब कमल खिलाने को तैयार हैं। मतलब साफ है, कल तक जो खुद एक-दूसरे के खिलाफ लड़ा करते थे, अब मिलकर जीतने के लिए मैदान में नजर आ रहे हैं या फिर यूं कहें कि जिन भानु की जीत अनुरागी के लिए किसी किरकिरी से कम नहीं थी, आज अनुरागी उन्हीं को जिताने की अपील करते नजर आएंगे। भानु और अनुरागी के बीच लड़ाई का सिलसिला करीब 15 साल पुराना है।
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जब पहली बार 2004 के लोकसभा चुनाव में दोनों एक-दूसरे के सामने आए। उस वक्त भानु दो बार सांसद रहकर एक मंझे हुए खिलाड़ी के रूप में मैदान में थे, जबकि अनुरागी का पहला ही लोकसभा चुनाव था, लिहाज परिणाम भी ऐसा ही रहा। भानु को 2004 के चुनाव में 1,95,228 मत मिले और अनुरागी को 1,68,437 ही मत मिले और भानु विजय घोषित किए गए। इसके बाद फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में भानु और अनुरागी आमने-सामने खड़े नजर आए। इस बार सूबे में बसपा की सरकार थी और जिला जालौन भी बसपा का गढ़ माना जाता था। ऐसी कठिन परिस्थितियों में अनुरागी ने संसदीय सीट पर भानु को ही हराकर पहेली बार साइकिल को जीत दिलाई और सांसद बने।
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2009 में अनुरागी को 2,83,023 मत और भाजपा के भानु को कुल 1,31,259 मतों पर ही संतोष करना पड़ा था। दोनों के बीच अभी तक का तीसरा और आखिरी मुकाबला मोदी लहर में 2014 में हुआ। जब भानु को 5 लाख से अधिक वोट मिले और अनुरागी को लगभग 2 लाख वोट पाकर तीसरे स्थान पर जाना पड़ा। 2015 तक अनुरागी साइकिल पर ही सवार रहे लेकिन 2016 में सपा ने अनुरागी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया तो 2019 में टिकट के लिए ही अनुरागी ने हाथी की सवारी यानी बसपा में जाने का फैसला किया। तब सभी को लग रहा था कि अनुरागी और भानु के बीच चौथा और रोमांचकारी मुकाबला 2019 में फिर देखने को मिलेगा लेकिन किसी को क्या पता था कि वक्त का पहिया ऐसा घूमेगा कि दोनों धुर विरोधी इस चुनाव में कंधे से कंधा मिलाए नजर आएंगे। हालांकि अनुरागी के भाजपा में शामिल होने के बाद से अभी तक जनपद के भाजपाई चुप्पी ही साधे हुए हैं।