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महागठबंधन से गड़बड़ाएंगे समीकरण
अमर उजाला, हाथरस
Updated Mon, 07 Nov 2016 11:18 PM IST
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राजनीति
- फोटो : demo
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भूवेंद्र सेंगर
प्रदेश में सपा, रालोद और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बढ़ती चर्चाओं ने जिले में विपक्षी दलों के ही नहीं बल्कि खुद सपा के दिग्गजों के भी चेहरों का रंग उड़ा दिया है। दिग्गजों को यह चिंता सताने लगी है कि अगर यह गठबंधन हो गया तो कहीं उनकी टिकट पर आंच नहीं आ जाए।
लिहाजा यह दिग्गज अब नए सिरे से अपनी सियासी रणनीति का ताना-बाना बुनने में जुट गए हैं। यह भी सही है कि अगर यह महागठबंधन हो गया तो निश्चित रूप से सूबे के सत्ताधारी दल की टिकटों में बड़े पैमाने पर फेरबदल हो सकता है, और इसकी आंच से हाथरस जिले के उम्मीदवार भी शायद ही बच पाएंगे।
सूत्र बताते हैं कि इन दावेदारों ने महागठबंधन से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए अभी से ही नई संभावनाओं की तलाश तेज कर दी है। नए सियासी घरौंदों में जगह बनाने की कोशिश हो रही है। दूसरे दलों के बडे़ नेताओं के दरबार में इनमें से कुछ की हाजिरी लगने की भी खबर है।
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जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर जातिगत समीकरणों के आधार पर अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रभाव माना जाता है। गठबंधन की स्थिति में इन राजनीति दलों द्वारा इन सीटों पर अपना-अपना दावा किया जाएगा। ऐसे में जो उम्मीदवार सत्ताधारी पार्टी का टिकट पा चुके हैं, उन्हें यह डर लग रहा है कि कहीं महागठबंधन के यज्ञ में उनकी सीट की आहुति नहीं दे दी जाए।
राजनीति के जानकारों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव में अगर हालात जस के तस रहते हैं और कोई गठनबंधन नहीं होता तो यहां की तीनों विधानसभा सीटों पर पंचकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
इसमें सादाबाद विधानसभा सीट की बात की जाए तो यहा भाजपा, कांग्रेस, बसपा एवं सपा के साथ रालोद की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। महागठबंधन की स्थिति में जाट बहुल इस सीट पर रालोद अपना दावा मजबूती से ठोकेगा। इसी प्रकार हाथरस विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस और रालोद दोनों ही दावा ठोकेंगे, क्योंकि यहां का जातीय समीकरण दोनों ही पार्टियों के मुफीद है।
केवल सिकंदराराऊ विधानसभा में ही सपा का परंपरागत यादव वोट बैंक होने के कारण उसका दावा अधिक मजबूत होगा। महागठबंधन की स्थिति में यहां सपा का सियासी समीकरण भी बदल सकता है। फिलहाल सपा, रालोद, कांग्रेस तीनों ही दलों के दिग्गजों और टिकटार्थियों की नजर इस महागठबंधन के भविष्य पर टिकी हैं, जिसके बाद वह अपनी अगली रणनीति तय करेंगे।
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प्रदेश में सपा, रालोद और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बढ़ती चर्चाओं ने जिले में विपक्षी दलों के ही नहीं बल्कि खुद सपा के दिग्गजों के भी चेहरों का रंग उड़ा दिया है। दिग्गजों को यह चिंता सताने लगी है कि अगर यह गठबंधन हो गया तो कहीं उनकी टिकट पर आंच नहीं आ जाए।
लिहाजा यह दिग्गज अब नए सिरे से अपनी सियासी रणनीति का ताना-बाना बुनने में जुट गए हैं। यह भी सही है कि अगर यह महागठबंधन हो गया तो निश्चित रूप से सूबे के सत्ताधारी दल की टिकटों में बड़े पैमाने पर फेरबदल हो सकता है, और इसकी आंच से हाथरस जिले के उम्मीदवार भी शायद ही बच पाएंगे।
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सूत्र बताते हैं कि इन दावेदारों ने महागठबंधन से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए अभी से ही नई संभावनाओं की तलाश तेज कर दी है। नए सियासी घरौंदों में जगह बनाने की कोशिश हो रही है। दूसरे दलों के बडे़ नेताओं के दरबार में इनमें से कुछ की हाजिरी लगने की भी खबर है।
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जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर जातिगत समीकरणों के आधार पर अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रभाव माना जाता है। गठबंधन की स्थिति में इन राजनीति दलों द्वारा इन सीटों पर अपना-अपना दावा किया जाएगा। ऐसे में जो उम्मीदवार सत्ताधारी पार्टी का टिकट पा चुके हैं, उन्हें यह डर लग रहा है कि कहीं महागठबंधन के यज्ञ में उनकी सीट की आहुति नहीं दे दी जाए।
राजनीति के जानकारों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव में अगर हालात जस के तस रहते हैं और कोई गठनबंधन नहीं होता तो यहां की तीनों विधानसभा सीटों पर पंचकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
इसमें सादाबाद विधानसभा सीट की बात की जाए तो यहा भाजपा, कांग्रेस, बसपा एवं सपा के साथ रालोद की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। महागठबंधन की स्थिति में जाट बहुल इस सीट पर रालोद अपना दावा मजबूती से ठोकेगा। इसी प्रकार हाथरस विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस और रालोद दोनों ही दावा ठोकेंगे, क्योंकि यहां का जातीय समीकरण दोनों ही पार्टियों के मुफीद है।
केवल सिकंदराराऊ विधानसभा में ही सपा का परंपरागत यादव वोट बैंक होने के कारण उसका दावा अधिक मजबूत होगा। महागठबंधन की स्थिति में यहां सपा का सियासी समीकरण भी बदल सकता है। फिलहाल सपा, रालोद, कांग्रेस तीनों ही दलों के दिग्गजों और टिकटार्थियों की नजर इस महागठबंधन के भविष्य पर टिकी हैं, जिसके बाद वह अपनी अगली रणनीति तय करेंगे।